गुरुग्राम: साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच गुरुग्राम में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो “डिजिटल अरेस्ट” जैसे खतरनाक फ्रॉड के जरिए लोगों को निशाना बना रहा था। इस कार्रवाई में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनके तार फिलीपींस और कंबोडिया तक जुड़े पाए गए हैं। शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि यह नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से भारत के टेलीकॉम सिस्टम को बायपास कर फर्जी कॉल्स के जरिए लोगों से ठगी कर रहा था।
मामले की शुरुआत पांच अलग-अलग शिकायतों से हुई, जिसके बाद गुरुग्राम के यू-ब्लॉक और चकरपुर इलाकों में एक साथ छापेमारी की गई। स्थानीय मकान मालिकों को जब किराए के घरों में संदिग्ध गतिविधियां नजर आईं—जहां रहने की बजाय तकनीकी उपकरण और वायरिंग लगी हुई थी—तब उन्होंने इसकी सूचना दी। यही सूचना इस बड़े खुलासे की वजह बनी।
किराए के घरों में बना रखे थे ‘फर्जी कॉल सेंटर’
छापेमारी के दौरान जिन जगहों पर कार्रवाई हुई, वहां पूरा सेटअप किसी मिनी टेलीकॉम हब जैसा था। जांच में 13 सिम बॉक्स, 504 सक्रिय सिम कार्ड, सात वाई-फाई कैमरे (ह्यूमन डिटेक्शन फीचर के साथ), कई राउटर, इन्वर्टर, बैटरियां और नेटवर्किंग डिवाइस बरामद किए गए।
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जांच एजेंसियों के मुताबिक, इन सिम बॉक्स का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय कॉल्स को लोकल नंबर के रूप में दिखाने के लिए किया जाता था, जिससे पीड़ित को यह लगे कि कॉल भारत के अंदर से ही आ रही है। यही तकनीक “डिजिटल अरेस्ट” जैसे फ्रॉड को विश्वसनीय बनाती है।
विदेश से मिलते थे निर्देश, भारत में चलता था ऑपरेशन
पूछताछ में सामने आया कि आरोपी राहुल कुमार सीधे फिलीपींस में बैठे हैंडलर्स के संपर्क में था। उसे वीडियो कॉल के जरिए सिम बॉक्स इंस्टॉल करने और कॉल रूटिंग की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद गुरुग्राम के अलग-अलग इलाकों, खासकर डीएलएफ फेज-3 में ये उपकरण लगाए गए।
वहीं, भविका रमेश भगचंदानी के कंबोडिया में सक्रिय गिरोह से संबंध सामने आए हैं। आरोप है कि वह ठगी से मिली रकम को क्रिप्टोकरेंसी—खासकर USDT—में बदलने और उसे विदेश भेजने में अहम भूमिका निभाती थी। यश अमृत सिंह डूगर इस पूरी वित्तीय प्रक्रिया में मध्यस्थ के तौर पर काम करता था।
जांच में यह भी पता चला कि यह गिरोह फिलीपींस से नेपाल, फिर बिहार होते हुए भारत में अवैध उपकरणों की सप्लाई करता था। इसके बाद इन्हें अलग-अलग शहरों में स्थापित कर नेटवर्क को विस्तार दिया जाता था।
‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम का खतरनाक मॉडल
आरोपियों ने पूछताछ में कबूल किया कि वे “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम के तहत लोगों को कॉल करते थे और खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताते थे। पीड़ितों को यह कहा जाता था कि वे किसी गंभीर मामले में फंसे हैं और गिरफ्तारी से बचने के लिए तुरंत पैसे ट्रांसफर करें।
इस दौरान उन्हें लगातार निगरानी में रखा जाता था ताकि वे किसी से संपर्क न कर सकें। डर और दबाव के कारण कई लोग अपनी जीवनभर की बचत तक ट्रांसफर कर देते थे।
‘साइबर स्लेवरी’ से भी जुड़े तार
जांच में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है—इस नेटवर्क के तार तथाकथित “साइबर स्लेवरी” से भी जुड़े हो सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार, कुछ लोगों को कंबोडिया जैसे देशों में ले जाकर जबरन साइबर ठगी के काम में लगाया जाता है।
बरामद वाई-फाई कैमरों का इस्तेमाल न सिर्फ सुरक्षा के लिए, बल्कि आसपास की गतिविधियों पर नजर रखने और पुलिस से बचने के लिए भी किया जा रहा था।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि अब साइबर अपराध पूरी तरह संगठित और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ले चुका है। उनके मुताबिक, “ऐसे गिरोह तकनीक और सोशल इंजीनियरिंग का खतरनाक मिश्रण इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे आम नागरिक आसानी से इनके जाल में फंस जाते हैं।”
जांच जारी, और खुलासों की उम्मीद
फिलहाल जांच एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने, पैसों के लेनदेन की पूरी कड़ी जोड़ने और देश-विदेश में सक्रिय सदस्यों तक पहुंचने में जुटी हैं। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
यह मामला साफ संकेत देता है कि साइबर ठगी अब स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है, क्योंकि एक छोटी सी चूक बड़े नुकसान में बदल सकती है।
