किराए के पते पर रजिस्टर्ड कंपनी से बड़े टैक्स फर्जीवाड़े का पर्दाफाश, मौके पर संचालन न मिलने से गहराया शक

“गाजियाबाद में ₹27 करोड़ कर चोरी का खुलासा: फर्जी फर्म के जरिए आईटीसी घोटाले ने बढ़ाई जांच की रफ्तार”

Roopa
By Roopa
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गाजियाबाद। इंदिरापुरम क्षेत्र में राज्य कर विभाग की जांच के दौरान ₹27 करोड़ की कर चोरी का बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि एक फर्जी फर्म के जरिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का गलत लाभ उठाकर सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया गया। मामले के सामने आने के बाद पूरे नेटवर्क की परतें खंगाली जा रही हैं और कई स्तरों पर जांच तेज कर दी गई है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025 में वसुंधरा सेक्टर-2 के पते पर धर्मेश एंटरप्राइजेज नाम से एक फर्म का पंजीकरण कराया गया था। शुरुआती दस्तावेजों में बैंक खाता, बिजली बिल और अन्य औपचारिक रिकॉर्ड सही पाए गए, जिससे पंजीकरण प्रक्रिया सामान्य रूप से पूरी हो गई। लेकिन बाद में डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक गतिविधियों में बड़ा अंतर सामने आने लगा।

जांच के दौरान यह पाया गया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में फर्म के नाम पर करीब ₹60 करोड़ का कारोबार दर्शाया गया था, जबकि वास्तविक स्तर पर ऐसा कोई व्यापारिक संचालन मौजूद नहीं था। विभागीय अधिकारियों को संदेह तब गहराया जब पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों और भौतिक सत्यापन में भारी असंगति मिली।

इसके बाद राज्य कर विभाग की टीम ने फर्म के पंजीकृत पते पर निरीक्षण किया। मौके पर पहुंचने पर न तो कोई कार्यालय मिला और न ही कोई व्यापारिक गतिविधि। स्थानीय स्तर पर पूछताछ में भी सामने आया कि उस पते पर इस नाम से कोई वास्तविक फर्म संचालित नहीं होती थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कंपनी केवल कागजों पर मौजूद थी।

प्रारंभिक जांच में सामने आया कि इस फर्जी फर्म के जरिए ₹16.17 करोड़ की इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा किया गया था। इसके अलावा, लगभग ₹10.91 करोड़ की टैक्स देनदारी को भी ITC के माध्यम से समायोजित दिखाकर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। कुल मिलाकर यह पूरा मामला एक सुनियोजित कर चोरी के मॉडल की ओर संकेत करता है।

अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की फर्जी फर्मों का उपयोग केवल बिलिंग और टैक्स क्रेडिट के दुरुपयोग के लिए किया जाता है। बिना वास्तविक खरीद-बिक्री के बड़े वित्तीय लेनदेन दिखाकर सिस्टम को गुमराह किया जाता है और बाद में कर की राशि को समायोजित कर दिया जाता है।

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जांच एजेंसियों ने इस मामले में संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है और अब पूरे नेटवर्क की जांच की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं और कितनी अन्य कंपनियां इसी तरीके से संचालित हो रही हैं।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार, डिजिटल फोरेंसिक जांच भी शुरू कर दी गई है। बैंक लेनदेन, जीएसटी पोर्टल डेटा, ई-वे बिल और अन्य रिकॉर्ड की गहन जांच की जा रही है ताकि पूरे लेनदेन नेटवर्क का खुलासा हो सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में फर्जी फर्मों का जाल तेजी से फैल रहा है, जो कर प्रणाली के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। बिना मजबूत सत्यापन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के ऐसे घोटालों को रोकना मुश्किल होता जा रहा है।

मामले के सामने आने के बाद कर विभाग ने फर्जी फर्मों के खिलाफ अभियान और तेज कर दिया है। नए पंजीकरण आवेदनों की जांच को और सख्त किया जा रहा है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों पर रोक लगाई जा सके।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फर्जी दस्तावेजों और गलत पते के आधार पर पंजीकरण कराने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही व्यापारिक समुदाय से भी अपील की गई है कि किसी भी संदिग्ध लेनदेन या फर्म की सूचना तुरंत विभाग को दें।

फिलहाल जांच जारी है और अधिकारियों को उम्मीद है कि जल्द ही पूरे नेटवर्क का खुलासा होगा और इस कर चोरी के पीछे की पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी।

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