HYBE चेयरमैन बैंग सी-ह्युक पर प्री-IPO डीलिंग्स और कथित निवेशक धोखे के मामले में गिरफ्तारी वारंट की मांग ने के-पॉप इंडस्ट्री में हलचल बढ़ा दी

“सरकारी ग्रांट के नाम पर ‘हाई-टेक’ जाल: IIT बनकर प्रोफेसरों को फंसाने की साजिश, करोड़ों की ठगी का खतरा”

Roopa
By Roopa
6 Min Read

मुंबई। देश में साइबर ठगी का दायरा तेजी से बढ़ते हुए अब शिक्षा और रिसर्च सेक्टर तक पहुंच गया है। एक नए और बेहद संगठित साइबर फ्रॉड मॉड्यूल में ठग खुद को IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़ा बताकर प्रोफेसरों और निजी विश्वविद्यालयों को सरकारी ग्रांट और हाई-वैल्यू रिसर्च प्रोजेक्ट का झांसा दे रहे हैं। इस ठगी का खुलासा तब हुआ जब कई शिक्षाविदों को करोड़ों रुपये के फर्जी प्रोजेक्ट प्रस्ताव भेजे गए और बदले में उनसे अग्रिम भुगतान की मांग की गई।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ठग खुद को देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों से जुड़ा बताते हुए दावा करते हैं कि उनके प्रस्ताव ‘अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF)’ से अनुमोदित हैं। वे संस्थानों को यह भरोसा दिलाते हैं कि प्रोजेक्ट को सुरक्षित करने और फंड जारी कराने के लिए कुल राशि का 2 से 3 प्रतिशत हिस्सा पहले एक एस्क्रो अकाउंट में जमा करना होगा। इस प्रक्रिया को ‘औपचारिक शुल्क’ या ‘प्रोजेक्ट सिक्योरिटी डिपॉजिट’ का नाम दिया जाता है।

इस साइबर जाल की सबसे बड़ी खासियत इसकी पेशेवर प्रस्तुति है। ठग प्रोजेक्ट का विस्तृत प्रस्ताव, तकनीकी सार और रिसर्च रोडमैप तक साझा करते हैं। कई प्रस्तावों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी प्रणाली, सीमा सुरक्षा और एडवांस टेक्नोलॉजी जैसे विषय शामिल होते हैं, जिससे पूरा प्रस्ताव वास्तविक और विश्वसनीय प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, ठग प्रतिष्ठित प्रोफेसरों और मौजूदा सरकारी योजनाओं का हवाला देकर अपनी बात को और मजबूत बनाने की कोशिश करते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस ठगी में निजी विश्वविद्यालय सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। इसका कारण यह है कि ये संस्थान अपनी राष्ट्रीय रैंकिंग और रिसर्च प्रोफाइल को बेहतर बनाने के लिए बड़े सहयोग और प्रोजेक्ट्स की तलाश में रहते हैं। ठग सीधे संस्थानों के शीर्ष प्रबंधन या प्रमोटर्स से संपर्क करते हैं, जहां वित्तीय फैसले तेजी से लिए जा सकते हैं और औपचारिक जांच प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सकता है।

एक मामले में, एक विश्वविद्यालय को ₹24 करोड़ के प्रोजेक्ट का प्रस्ताव दिया गया और बेहद कम समय में भुगतान करने का दबाव बनाया गया। हालांकि जब संबंधित व्यक्ति से आधिकारिक ईमेल या सत्यापन मांगा गया, तो वह अचानक संपर्क से बाहर हो गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पूरा मामला सुनियोजित ठगी का हिस्सा था।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि ANRF जैसी संस्थाएं किसी भी स्थिति में प्रोजेक्ट या ग्रांट के लिए अग्रिम भुगतान की मांग नहीं करतीं। उनकी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित होती है। संस्थानों को ऐसे प्रस्तावों से सतर्क रहने और हर स्तर पर सत्यापन सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है। जल्द ही इस संबंध में औपचारिक एडवाइजरी भी जारी की जा सकती है।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

इस बीच, ‘फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन’ ने भी इस नए साइबर ट्रेंड को लेकर चिंता जताई है। फाउंडेशन के विश्लेषकों के अनुसार, साइबर अपराधी अब ऐसे सेक्टर को निशाना बना रहे हैं जहां भरोसा और प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षा और रिसर्च क्षेत्र को ‘लो-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड’ टारगेट के रूप में देखा जा रहा है।

प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने इस पर चेतावनी देते हुए कहा, “यह ठगी सोशल इंजीनियरिंग का बेहद उन्नत रूप है, जिसमें अपराधी विश्वसनीयता, दबाव और तात्कालिकता का इस्तेमाल करते हैं। शिक्षाविद उच्च ज्ञान रखते हैं, लेकिन प्रक्रिया आधारित सतर्कता में चूक हो जाती है। किसी भी सरकारी ग्रांट के नाम पर अग्रिम भुगतान की मांग सबसे बड़ा रेड फ्लैग है और इसे तुरंत संदिग्ध मानना चाहिए।”

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले उसकी आधिकारिक पुष्टि की जाए, केवल सत्यापित ईमेल डोमेन और संस्थागत चैनल पर ही भरोसा किया जाए, और किसी भी स्थिति में अग्रिम भुगतान से बचा जाए।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष भी इसी तरह के एक मामले में एक विश्वविद्यालय को करीब ₹2.5 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा था। उस मामले में भी ठगों ने फर्जी शैक्षणिक प्रोफाइल और दस्तावेज तैयार कर खुद को अत्यंत विश्वसनीय साबित किया था।

यह घटनाक्रम संकेत देता है कि साइबर अपराधी अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर विशेष क्षेत्रों को टारगेट कर रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और फंडिंग की होड़ ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है।

फिलहाल, संस्थानों से अपील की गई है कि वे हर प्रस्ताव की गहन जांच करें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत शिकायत दर्ज कराएं। डिजिटल दौर में भरोसा अब बिना सत्यापन के नहीं किया जा सकता—क्योंकि एक छोटी सी लापरवाही करोड़ों के नुकसान में बदल सकती है।

हमसे जुड़ें

Share This Article