नई दिल्ली: राजधानी में शिक्षा के नाम पर चल रहे एक संगठित ठगी नेटवर्क का खुलासा करते हुए दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में एक बड़े फर्जी डिग्री गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। कॉल सेंटर के जरिये संचालित इस रैकेट में देशभर के युवाओं को नकली डिग्री, मार्कशीट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट बेचकर लाखों रुपये की ठगी की जा रही थी। इस मामले में सात मुख्य आरोपियों—संजीव कुमार मौर्य, जनक नेउपाने, किशन कुमार, विक्की कुमार झा, आशीष थपलियाल, आकाश कुमार और संजय आर्य—को गिरफ्तार किया गया है, जबकि 28 अन्य कर्मचारियों को जांच में शामिल होने के लिए बाउंड डाउन किया गया है।
जांच में सामने आया है कि यह गिरोह ‘महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ के नाम का दुरुपयोग कर रहा था। आरोपी पिछली तारीखों में फर्जी डिग्रियां तैयार कर उन्हें असली जैसा दिखाकर बेचते थे। दस्तावेजों की डिजाइनिंग इतनी पेशेवर तरीके से की जाती थी कि आम व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल था। गिरोह ने अपने पूरे ऑपरेशन को एक कॉर्पोरेट कॉल सेंटर का रूप दे रखा था, जिससे यह धंधा लंबे समय तक बिना शक के चलता रहा।
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सूत्रों के अनुसार, 6 अप्रैल को इस अवैध गतिविधि की गुप्त सूचना मिलने के बाद एक विशेष टीम का गठन किया गया। इसके बाद गोविंदपुरी के गुरु रविदास मार्ग स्थित टीए-205, दूसरी मंजिल पर स्थित परिसर में योजनाबद्ध तरीके से छापेमारी की गई। मौके पर चल रहे कॉल सेंटर से आरोपियों को रंगे हाथों पकड़ा गया। वहां से कंप्यूटर सिस्टम, मोबाइल फोन, प्रिंटर, फर्जी दस्तावेजों के सैंपल, डेटा रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल साक्ष्य बरामद किए गए हैं, जो इस संगठित नेटवर्क के संचालन को उजागर करते हैं।
तफ्तीश में यह भी सामने आया है कि गिरोह टेलीकॉलर्स की भर्ती ‘वर्कइंडिया’ जैसे जॉब पोर्टल्स के माध्यम से करता था। इन कर्मचारियों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे एक वैध शैक्षणिक संस्थान के लिए काम कर रहे हैं। टेलीकॉलर्स खुद को कॉलेज या यूनिवर्सिटी का फैकल्टी सदस्य बताकर लोगों से संपर्क करते थे और उन्हें कम समय में डिग्री दिलाने का भरोसा देते थे। इस प्रक्रिया में खासतौर पर उन युवाओं को निशाना बनाया जाता था, जिन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी या जल्दी नौकरी पाने के लिए शॉर्टकट तलाश रहे थे।
गिरोह थर्ड-पार्टी स्रोतों से छात्रों और नौकरी तलाशने वालों का डेटा खरीदता था। इसके बाद इन संभावित पीड़ितों को कॉल कर उन्हें स्कीम के बारे में बताया जाता और भरोसे में लिया जाता था। भुगतान प्राप्त होने के बाद आरोपियों द्वारा गूगल शीट पर पूरे लेनदेन का रिकॉर्ड रखा जाता था, जिससे गिरोह के भीतर हर सदस्य की गतिविधियों पर नजर बनी रहे और रकम का हिसाब पारदर्शी तरीके से चलता रहे।
फर्जी डिग्री और ट्रांसक्रिप्ट तैयार करने के बाद इन्हें व्हाट्सएप के जरिए पीड़ितों को भेज दिया जाता था। कई मामलों में इन दस्तावेजों का उपयोग नौकरी के लिए भी किया गया, जिससे इस गिरोह की ठगी का दायरा और गंभीर हो जाता है। जांच एजेंसियां अब उन लोगों की भी पहचान करने में जुटी हैं, जिन्होंने इन फर्जी डिग्रियों का इस्तेमाल किया।
साइबर अपराध के जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सोशल इंजीनियरिंग और डिजिटल टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। प्रख्यात साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, “आजकल ठग पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर संगठित डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं। फर्जी डिग्री जैसे मामलों में वे खासतौर पर उन लोगों को निशाना बनाते हैं जो जल्दी सफलता चाहते हैं। प्रोफेशनल कॉल सेंटर, डेटा एनालिटिक्स और सोशल इंजीनियरिंग के जरिए ये गिरोह खुद को पूरी तरह वैध दिखाने में सफल हो जाते हैं, जिससे लोग आसानी से इनके झांसे में आ जाते हैं।”
फिलहाल मामले में आगे की जांच जारी है। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों और इसके विस्तार का पता लगाया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस रैकेट से जुड़े और खुलासे हो सकते हैं, जिससे इस पूरे फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
