दिल्ली पुलिस ने DDU अस्पताल से मुफ्त सरकारी दवाओं को निजी बिक्री में मोड़ने वाले कथित रैकेट का खुलासा कर ₹70 लाख का स्टॉक बरामद किया।

सरकारी दवाओं की कालाबाजारी का बड़ा खुलासा: अस्पताल से चोरी कर बाजार में बेच रहे थे गिरोह के सदस्य, ₹70 लाख का स्टॉक बरामद

Team The420
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नई दिल्ली: राजधानी में सरकारी अस्पतालों से दवाएं चोरी कर उन्हें खुले बाजार में बेचने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें अस्पताल से जुड़े कर्मचारी भी शामिल हैं। जांच में सामने आया है कि यह गिरोह लंबे समय से मुफ्त मिलने वाली जीवनरक्षक दवाओं को बाहर बेचकर भारी मुनाफा कमा रहा था। बरामद दवाओं की कीमत करीब ₹70 लाख बताई जा रही है।

जांच के दौरान सामने आया कि गिरोह में शामिल मुख्य आरोपी बिनेश कुमार, जो अस्पताल में फार्मासिस्ट और स्टोरकीपर के रूप में तैनात था, अपने सहयोगी प्रकाश मेहतो के साथ मिलकर दवाओं को स्टोर से बाहर निकालता था। इसके बाद इन्हें अन्य आरोपियों—नीरज कुमार, सुशील कुमार और लक्ष्मण मुखिया—के जरिए बाजार में पहुंचाया जाता था।

अस्पताल से निकलकर बाजार तक पहुंचती थीं दवाएं

पूरे नेटवर्क का संचालन बेहद संगठित तरीके से किया जा रहा था। अस्पताल के स्टोर से दवाएं निकालने के बाद उन्हें वाहनों के जरिए अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाया जाता था। पकड़े गए आरोपियों के पास से एक मिनी टेंपो और एक कार भी बरामद की गई है, जिनका इस्तेमाल सप्लाई के लिए किया जाता था।

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी नीरज कुमार उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दवा कारोबार से जुड़ा हुआ है और वह इन सरकारी दवाओं को अपनी दुकान के जरिए बेचने के अलावा अन्य विक्रेताओं तक भी पहुंचाता था। इस तरह यह नेटवर्क दिल्ली से बाहर अन्य राज्यों तक फैला हुआ था।

जीवनरक्षक दवाएं भी शामिल

बरामद दवाओं में एंटीबायोटिक्स, एंटीवायरल, रेबीज से जुड़ी दवाएं और कई गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन शामिल हैं। इनमें से कई दवाएं ऐसी हैं जो आमतौर पर सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दी जाती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की कालाबाजारी न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि यह मरीजों के जीवन के साथ भी खिलवाड़ है। जिन दवाओं को जरूरतमंदों तक मुफ्त पहुंचना चाहिए, वे बाजार में बेची जा रही थीं।

छापेमारी में हुआ खुलासा

मामले का खुलासा तब हुआ जब जांच के दौरान सूचना मिली कि राजेंद्र मार्केट और तीस हजारी इलाके से दवाओं की बड़ी खेप ट्रांसपोर्ट के जरिए भेजी जा रही है। मौके पर पहुंचकर टीम ने एक कार और मिनी टेंपो से भारी मात्रा में दवाएं बरामद कीं और तीन आरोपियों—नीरज कुमार, सुशील कुमार और लक्ष्मण मुखिया—को गिरफ्तार कर लिया।

पूछताछ के दौरान इन आरोपियों ने पूरे नेटवर्क का खुलासा किया, जिसके बाद अस्पताल से जुड़े बिनेश कुमार और प्रकाश मेहतो को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

अस्पताल में आंतरिक जांच शुरू

मामले के सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने तुरंत आंतरिक जांच समिति गठित कर दी है। जांच के दायरे में अन्य कर्मचारियों के शामिल होने की भी आशंका जताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, संबंधित दवा स्टोर को सील कर दिया गया है और रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

प्रशासनिक स्तर पर यह भी संकेत मिले हैं कि दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें निलंबन और बर्खास्तगी शामिल हो सकती है।

संगठित नेटवर्क का संकेत

प्रारंभिक जांच से यह स्पष्ट हुआ है कि यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित नेटवर्क का हिस्सा है। दवाओं की चोरी, परिवहन और बिक्री—तीनों स्तरों पर अलग-अलग लोग काम कर रहे थे, जिससे इस अवैध कारोबार को लंबे समय तक चलाया जा सका।

यह मामला सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी की कमी को भी उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के स्टॉक, वितरण और उपयोग पर कड़ी निगरानी रखने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम और नियमित ऑडिट की आवश्यकता है।

जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मामला

सरकारी अस्पतालों की दवाओं की इस तरह की कालाबाजारी सीधे तौर पर आम जनता को प्रभावित करती है, खासकर उन मरीजों को जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और इलाज के लिए सरकारी सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं।

दिल्ली में सामने आया यह मामला एक चेतावनी है कि अगर समय रहते ऐसे नेटवर्क पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है। फिलहाल जांच जारी है और अधिकारियों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में इस रैकेट से जुड़े और बड़े खुलासे हो सकते हैं

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