चेन्नई: चेन्नई स्थित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से जुड़े ₹1.97 करोड़ के डेयरी लोन धोखाधड़ी मामले में आठ लोगों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। दोषियों में एसबीआई के दो पूर्व अधिकारी और छह निजी व्यक्ति शामिल हैं। अदालत ने कारावास के साथ दोषियों पर करोड़ों रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया है। यह फैसला 31 जुलाई को सुनाया गया।
दोषी ठहराए गए पूर्व बैंक अधिकारियों में उस समय एसबीआई की चेंगम शाखा के शाखा प्रबंधक रहे एन. गोपालकृष्णन तथा ग्रामीण विपणन एवं रिकवरी अधिकारी पी. बालमुरली शामिल हैं। इनके अलावा आर. वेंकटरामन, एस. रवि, डी. शंकर, आर. राजन, पी. पन्नीरसेल्वम और टी. मुरुगन को भी अदालत ने दोषी पाया। सभी आठ दोषियों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।
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अदालत ने आर्थिक दंड भी लगाया है। एन. गोपालकृष्णन, पी. बालमुरली, आर. वेंकटरामन, एस. रवि और डी. शंकर पर ₹50-50 लाख का जुर्माना लगाया गया है, जबकि आर. राजन, पी. पन्नीरसेल्वम और टी. मुरुगन को ₹20-20 लाख का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया है।
मामला अक्टूबर 2007 से मई 2008 के बीच का है। जांच के अनुसार इस अवधि में एसबीआई की चेंगम शाखा से 728 डेयरी ऋण स्वीकृत किए गए थे, जिनकी कुल राशि लगभग ₹2.33 करोड़ थी। बाद में जांच में सामने आया कि इन ऋणों की स्वीकृति प्रक्रिया में व्यापक अनियमितताएं बरती गईं और बैंक को ₹1,97,27,692 का गलत वित्तीय नुकसान हुआ।
इस मामले की शुरुआत 23 सितंबर 2011 को हुई, जब एसबीआई के रीजन-5, चेंगलपेट के क्षेत्रीय प्रबंधक की शिकायत के आधार पर सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज की। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि बैंक अधिकारियों ने कांथम्मा मिल्क चिलिंग प्लांट के मालिक के. पुरुषोत्तमन तथा अन्य लोगों के साथ कथित साजिश रचकर डेयरी ऋण स्वीकृत कराए। यह पूरा ऋण वितरण कथित रूप से मिल्क चिलिंग प्लांट के साथ एक त्रिपक्षीय व्यवस्था के तहत किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार ऋण प्राप्त करने के लिए कथित उधारकर्ताओं के नाम पर फर्जी आवेदन पत्र, जाली दस्तावेज और अन्य कूटरचित अभिलेख तैयार कर बैंक में प्रस्तुत किए गए। जांच में यह भी पाया गया कि डेयरी ऋण स्वीकृत करने से पहले और ऋण वितरण के बाद अपनाई जाने वाली अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। इसी कारण बड़ी संख्या में स्वीकृत ऋण अनियमित साबित हुए और बैंक को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 25 जून 2013 को कुल 10 आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। इसके बाद विशेष अदालत ने 1 मई 2016 को आरोप तय कर मुकदमे की सुनवाई शुरू की। हालांकि सुनवाई के दौरान दो आरोपियों—के. पुरुषोत्तमन और एसबीआई के पूर्व उप प्रबंधक (एडवांस) के. रविचंद्रन—की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
लंबी सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद शेष आठ आरोपियों को बैंक धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जुड़े आरोपों में दोषी करार दिया। इसके बाद अदालत ने सभी दोषियों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास और भारी आर्थिक दंड की सजा सुनाई।
यह फैसला बैंकिंग प्रणाली में वित्तीय अनुशासन और ऋण वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जांच एजेंसियों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में फर्जी दस्तावेजों और मिलीभगत के जरिए किए जाने वाले ऋण घोटालों पर कठोर कार्रवाई वित्तीय संस्थानों में जवाबदेही मजबूत करने और भविष्य में इस प्रकार की धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक है।
