चंडीगढ़: चंडीगढ़ की एक स्थानीय अदालत ने साइबर ठगी से जुड़े कथित “म्यूल अकाउंट” धारक की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। आरोपी पर आरोप है कि उसने अपने बैंक खाते का इस्तेमाल फर्जी निवेश योजनाओं, पार्ट-टाइम नौकरी के नाम पर ठगी और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों से प्राप्त रकम को प्राप्त करने और निकालने के लिए होने दिया। अदालत ने कहा कि जांच में आरोपी के बैंक खाते से जुड़े कई संदिग्ध वित्तीय लेनदेन सामने आए हैं, जिससे उसकी भूमिका उस सह-आरोपी से अलग प्रतीत होती है जिसे पहले जमानत मिल चुकी है।
यह मामला भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से प्राप्त इनपुट के आधार पर चंडीगढ़ साइबर क्राइम पुलिस द्वारा शुरू की गई जांच से सामने आया। जांचकर्ताओं ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज शिकायतों का विश्लेषण किया और ऐसे कई बैंक खातों की पहचान की, जिनका कथित तौर पर साइबर अपराधियों द्वारा “म्यूल अकाउंट” के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। ऐसे खाते आमतौर पर ठगी की रकम प्राप्त करने और उसे तेजी से अन्य खातों में स्थानांतरित या नकद निकालकर धन के स्रोत को छिपाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपी भीम सरोज के नाम से संचालित एक इंडसइंड बैंक खाते में NCRP पर दर्ज अलग-अलग साइबर ठगी मामलों से जुड़े ₹50,000, ₹4.50 लाख और ₹1 लाख जमा हुए थे। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस खाते का उपयोग ऑनलाइन निवेश ठगी, फर्जी नौकरी के प्रस्ताव और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों से प्राप्त धन को प्राप्त करने के लिए किया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार पूछताछ में सरोज ने बताया कि वह आईसीआईसीआई बैंक में चपरासी के रूप में कार्यरत था और उसका इंडसइंड बैंक खाता उसके परिचित सलमान अंसारी ने आर्थिक लाभ के बदले खुलवाया था। इस जानकारी के आधार पर पुलिस ने अंसारी को गिरफ्तार किया और उसके कब्जे से सरोज की चेकबुक, पैन कार्ड तथा विभिन्न कंपनियों की कई मुहरें बरामद कीं, जिनका कथित तौर पर चालू खाते खोलने में उपयोग किया जाता था।
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जांच में आगे यह भी सामने आया कि अंसारी ने कथित रूप से यह बैंक खाता धरमबीर कालिया नामक व्यक्ति को सौंप दिया था, जो फिलहाल फरार बताया जा रहा है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है और यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या इस नेटवर्क में अन्य बैंक खाते भी साइबर ठगी के लिए इस्तेमाल किए गए।
नियमित जमानत की मांग करते हुए सरोज ने अदालत में दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है और उसे सह-आरोपी अंसारी की तरह जमानत का लाभ मिलना चाहिए। हालांकि अदालत ने यह दलील स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों की भूमिका अलग-अलग है। जहां अंसारी पर बैंक खाता खुलवाने में मदद करने का आरोप है, वहीं सरोज के खाते में कथित तौर पर साइबर ठगी की रकम प्राप्त हुई और बाद में उसे निकाला भी गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जांच के दौरान आरोपी के खाते से जुड़े कई संदिग्ध लेनदेन सामने आए हैं और मामले की गहन जांच अभी जारी है। उपलब्ध साक्ष्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए इस स्तर पर नियमित जमानत देना उचित नहीं होगा।
भीम सरोज और सलमान अंसारी को मई 2026 में ऑपरेशन म्यूल हंट के तहत गिरफ्तार किया गया था। यह अभियान साइबर अपराधों में बैंक खातों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। इसके तहत ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है जो जानबूझकर या लापरवाही से अपने बैंक खाते साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि म्यूल अकाउंट आज संगठित साइबर अपराध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इनके माध्यम से अपराधी ठगी की रकम को तेजी से अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर जांच एजेंसियों के लिए धन का पता लगाना कठिन बना देते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे किसी भी आर्थिक लाभ के लालच में अपना बैंक खाता, चेकबुक, एटीएम कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग विवरण या केवाईसी दस्तावेज किसी अन्य व्यक्ति को न दें। उनके अनुसार बैंकों में मजबूत केवाईसी प्रणाली, रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और व्यापक जनजागरूकता से म्यूल अकाउंट नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
