सूरत से दबोचा गया फर्जी पहचान में छिपा आरोपी, दिल्ली के बुजुर्ग से ठगी गई रकम के मामले में साइबर नेटवर्क और फर्जी संस्था की भूमिका उजागर

CBI की बड़ी कार्रवाई: किडनैपिंग केस में फरार आरोपी गिरफ्तार, ₹23 करोड़ के ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड में चार्जशीट दाखिल

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By Roopa
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नई दिल्ली: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक पुराने अपहरण मामले में वर्षों से फरार चल रहे आरोपी को गिरफ्तार करते हुए साइबर फ्रॉड के एक बड़े मामले में चार्जशीट दाखिल की है। यह मामला करीब ₹23 करोड़ की साइबर ठगी से जुड़ा है, जिसमें एक दिल्ली निवासी वरिष्ठ नागरिक को ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम के जरिए निशाना बनाया गया था।

अपहरण मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी की पहचान भोला सिंह के रूप में हुई है, जो गौतम कुमार और अमित शर्मा जैसे फर्जी नामों से भी पहचान छिपाकर रह रहा था। आरोपी को गुजरात के सूरत से पकड़ा गया, जहां वह फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लंबे समय से छिपकर रह रहा था। यह मामला 2014 में दर्ज एक किडनैपिंग केस से जुड़ा है, जिसमें दो लोगों के अपहरण का आरोप था और बाद में इसे जांच के लिए CBI को सौंप दिया गया था।

जानकारी के अनुसार, आरोपी 2015 से फरार चल रहा था और उसके खिलाफ बिहार पुलिस में हत्या, हत्या के प्रयास, अवैध हथियार रखने और विस्फोटक सामग्री से जुड़े कुल 11 से अधिक मामले दर्ज हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि वह लगातार अपनी पहचान बदलकर अलग-अलग राज्यों में रह रहा था और फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल कर रहा था।

इसी बीच CBI ने एक अलग लेकिन गंभीर साइबर फ्रॉड मामले में चार्जशीट भी दाखिल की है। यह मामला एक संगठित साइबर नेटवर्क से जुड़ा है, जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक को डिजिटल गिरफ्तारी का डर दिखाकर ठगा गया। ठगों ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जुड़ा बताकर वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को डराया और उसे लगातार कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर मानसिक दबाव में रखा।

इस पूरे फ्रॉड में पीड़ित से लगभग ₹23 करोड़ की रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई गई। जांच में सामने आया कि यह रकम एक संगठित नेटवर्क के जरिए घुमाई गई और बाद में विभिन्न संस्थाओं और खातों में भेजी गई, ताकि पैसों की असली ट्रेल छुपाई जा सके।

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इस मामले में एक मुख्य आरोपी सिलीगुड़ी निवासी साग्निक रॉय को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और वह न्यायिक हिरासत में है। चार्जशीट में एक फर्जी संस्था “Securing World Social and Economic Development Council” का भी उल्लेख किया गया है, जिसका उपयोग ठगी की रकम को चैनलाइज करने के लिए किया गया था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस तरह के ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम में अपराधी पीड़ित को यह विश्वास दिलाते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है। इसके बाद वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज और धमकी भरे संवादों के जरिए मानसिक दबाव बनाया जाता है, जिससे पीड़ित डरकर अपनी संपत्ति ट्रांसफर कर देता है।

अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराधी अब पारंपरिक ठगी से आगे बढ़कर अत्याधुनिक मनोवैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये नेटवर्क न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फैले हुए हैं और बैंकिंग सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाकर पैसे को तेजी से अलग-अलग खातों और माध्यमों में घुमा देते हैं।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर साइबर सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसियां लगातार ऐसे नेटवर्क की पहचान और वित्तीय ट्रेल को ट्रैक करने में जुटी हैं, लेकिन जटिल लेयरिंग और फर्जी संस्थाओं के इस्तेमाल के कारण धन की रिकवरी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

CBI की यह कार्रवाई दो अलग-अलग लेकिन जुड़े हुए पहलुओं को उजागर करती है—एक ओर वर्षों से फरार अपराधी की गिरफ्तारी और दूसरी ओर डिजिटल युग में तेजी से बढ़ते साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश। ₹23 करोड़ की इस ठगी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ अपराध के तरीके भी लगातार अधिक जटिल और खतरनाक होते जा रहे हैं।

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