फर्जी बैंक खाते, ई-वे बिल और सर्कुलर ट्रेडिंग के माध्यम से इनपुट टैक्स क्रेडिट हासिल करने का आरोप; लैपटॉप, मोबाइल, फर्जी आधार कार्ड, ₹3.18 करोड़ से अधिक के हस्ताक्षरित चेक और करोड़ों के हिसाब वाली डायरी बरामद

₹118 करोड़ जीएसटी धोखाधड़ी का पर्दाफाश: फर्जी फर्मों, हवाला और डिजिटल वॉलेट के जरिए चल रहा था संगठित नेटवर्क, दो गिरफ्तार

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By Roopa
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बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली में पुलिस ने ₹118 करोड़ की कथित जीएसटी धोखाधड़ी का खुलासा करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपियों ने फर्जी फर्मों, बैंक खातों, नकली व्यापारिक दस्तावेजों और सर्कुलर ट्रेडिंग के जरिए बड़े पैमाने पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का अवैध लाभ हासिल किया। मामले में गिरफ्तार आरोपियों की पहचान योगेंद्र शर्मा और टिंकू के रूप में हुई है। दोनों गाजियाबाद में रहकर कथित तौर पर इस नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, जबकि गिरोह के अन्य सदस्यों और वित्तीय नेटवर्क की तलाश जारी है।

पुलिस के अनुसार, 21 जुलाई को मालगोदाम रोड क्षेत्र में की गई कार्रवाई के दौरान दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। तलाशी में उनके कब्जे से दो लैपटॉप, छह मोबाइल फोन, फर्जी आधार कार्ड, कई बैंक चेकबुक, ₹3.18 करोड़ से अधिक मूल्य के हस्ताक्षरित चेक और करोड़ों रुपये के लेनदेन का विवरण दर्ज एक लाल डायरी बरामद की गई। जांच अधिकारियों का मानना है कि ये दस्तावेज पूरे नेटवर्क की वित्तीय गतिविधियों और धन के प्रवाह का महत्वपूर्ण सुराग प्रदान कर सकते हैं।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह सीधे-सादे लोगों को आर्थिक लाभ का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते और फर्जी कंपनियां खुलवाता था। इसके बाद इन्हीं फर्मों के नाम से फर्जी ई-वे बिल, खरीद-बिक्री के दस्तावेज और व्यापारिक रिकॉर्ड तैयार किए जाते थे। कागजों पर बड़े पैमाने पर कारोबार दर्शाकर इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किया जाता था, जबकि वास्तविक व्यापार का कोई अस्तित्व नहीं होता था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, फर्जी दस्तावेज तैयार करने के बाद गिरोह कथित तौर पर “सर्कुलर ट्रेडिंग” का सहारा लेता था। इस प्रक्रिया में एक ही माल या काल्पनिक व्यापार को कई कंपनियों के बीच बार-बार दर्शाकर वैध कारोबारी गतिविधि का भ्रम पैदा किया जाता था। इससे कर अधिकारियों के समक्ष लेनदेन वास्तविक प्रतीत होता था और फर्जी आईटीसी हासिल करना आसान हो जाता था। पुलिस का कहना है कि इस तरीके से सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

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जांच में यह भी सामने आया है कि फर्जी कारोबार से प्राप्त धनराशि को विभिन्न माध्यमों से छिपाया जाता था। पुलिस के अनुसार, रकम को सराफा कारोबार, डिजिटल वॉलेट, फॉरेक्स चैनलों और हवाला नेटवर्क के जरिए आगे भेजा जाता था ताकि उसके वास्तविक स्रोत का पता लगाना कठिन हो जाए। जांच अधिकारियों का दावा है कि गिरोह नकदी के बंटवारे के दौरान नोटों के सीरियल नंबर को भी एक प्रकार की कोड भाषा के रूप में इस्तेमाल करता था, जिससे आंतरिक लेनदेन को गुप्त रखा जा सके।

पुलिस के अनुसार, जांच में वर्ष 2017-18 से सक्रिय एक बड़े नेटवर्क के संकेत मिले हैं। अधिकारियों का आरोप है कि अनमोल, अंकित, शिशिर बंसल, सुनील, दीपक और साहिल सहित कई अन्य लोग भी इस कथित नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। जांच में इंडियन ट्रेडर्स, राधे ट्रेडर्स, सज्जन ट्रेडर्स और पीसी इंटरप्राइजेज जैसी फर्जी फर्मों के नाम सामने आए हैं। पुलिस का दावा है कि केवल पीसी इंटरप्राइजेज के माध्यम से ही लगभग ₹20 करोड़ का फर्जी कारोबार दिखाकर ₹1.28 करोड़ से अधिक का जीएसटी धोखाधड़ी की गई।

जांच एजेंसियां अब बरामद लैपटॉप, मोबाइल फोन, बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल दस्तावेज, वित्तीय लेनदेन और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का फॉरेंसिक विश्लेषण कर रही हैं। इसके साथ ही विभिन्न राज्यों में संचालित बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट, हवाला चैनलों और संभावित लाभार्थियों की पहचान भी की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस नेटवर्क का संबंध अन्य राज्यों में संचालित जीएसटी धोखाधड़ी के मामलों से तो नहीं है।

Future Crime Research Foundation के विशेषज्ञों के अनुसार, फर्जी फर्मों, म्यूल बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट और हवाला नेटवर्क का संयुक्त उपयोग अब आर्थिक अपराधों का प्रमुख तरीका बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कर प्रशासन, बैंकिंग संस्थानों और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच रीयल-टाइम डेटा साझा करने, संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की निगरानी और मजबूत डिजिटल सत्यापन प्रणाली से ऐसे संगठित वित्तीय अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

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