नई दिल्ली: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) द्वारा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित एनएमसी हेल्थकेयर (NMC Healthcare) से जुड़े दिवालिया मामलों के निपटारे के लिए लगभग 600 मिलियन डॉलर (करीब ₹5,700 करोड़) का भुगतान किए जाने के बाद इस समझौते को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। अबू धाबी ग्लोबल मार्केट (ADGM) कोर्ट के रिकॉर्ड में बैंक पर एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) नियमों के कथित उल्लंघन, पर्याप्त जांच-पड़ताल नहीं करने और एनएमसी हेल्थकेयर की वास्तविक वित्तीय स्थिति छिपाने में सहयोग करने जैसे गंभीर आरोप दर्ज होने का उल्लेख है। हालांकि बैंक का कहना है कि यह भुगतान किसी प्रकार की गलती स्वीकार करने के बजाय लंबे समय से चल रहे मुकदमों को समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया समझौता है।
बैंक ने 2 जुलाई को भारतीय शेयर बाजारों को दी गई सूचना में बताया था कि उसने एनएमसी हेल्थकेयर के संस्थापक बी.आर. शेट्टी और पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रशांत मंघाट से जुड़े 5 अरब डॉलर से अधिक के दिवालिया मामलों के निपटारे के तहत यह राशि अदा की है। बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते की शर्तें गोपनीय हैं और उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्रालय से अनुमति मिलने के बाद किए गए इस भुगतान का उद्देश्य लंबी कानूनी प्रक्रिया, अनिश्चितता और उससे जुड़े खर्चों से बचना बताया गया।
विवाद की जड़ वर्ष 2019 में सामने आए एनएमसी हेल्थकेयर के वित्तीय संकट से जुड़ी है। उस समय कंपनी पर अपनी बैलेंस शीट में वास्तविक देनदारियां कम दिखाने का आरोप लगा था। बाद की जांच में लगभग 5.4 अरब डॉलर के ऋण का खुलासा हुआ, जिसे कथित रूप से रिपोर्ट नहीं किया गया था। इस मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा की अबू धाबी शाखा की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। हालांकि बैंक ने अब तक यह सार्वजनिक नहीं किया है कि उसने एनएमसी हेल्थकेयर और उससे जुड़ी कंपनियों को कुल कितना ऋण दिया था और उसमें वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ।
मार्च 2025 में अबू धाबी ग्लोबल मार्केट कोर्ट के एक निर्णय में संयुक्त प्रशासकों ने आरोप लगाया था कि बैंक ऑफ बड़ौदा की अबू धाबी शाखा ने ऐसे वित्तीय लेनदेन और बैंकिंग व्यवस्थाओं को सुविधा प्रदान की, जिनके कारण एनएमसी हेल्थकेयर तथा उससे जुड़ी 37 कंपनियां अपनी वास्तविक वित्तीय स्थिति छिपाने में सफल रहीं। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख है कि बैंक पर पर्याप्त एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML), नो योर कस्टमर (KYC) और ड्यू डिलिजेंस प्रक्रियाओं का पालन नहीं करने के आरोप लगाए गए। बैंक ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि समझौते का अर्थ किसी भी आरोप को स्वीकार करना नहीं है।
मामले से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, एनएमसी हेल्थकेयर के संस्थापक बी.आर. शेट्टी ने अपने पूर्व सीईओ प्रशांत मंघाट पर बैंक अधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत का आरोप लगाया था। दूसरी ओर, दिवालिया प्रशासकों ने बैंक, शेट्टी और मंघाट के खिलाफ धोखाधड़ी तथा गलत व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े दावे अदालत में प्रस्तुत किए थे। इन दावों में नागरिक दायित्वों के साथ-साथ दिवालिया कानून के तहत भी विभिन्न आरोप शामिल किए गए।
सितंबर 2020 में बैंक ऑफ बड़ौदा ने एनएमसी हेल्थकेयर और उससे जुड़ी कंपनियों से बकाया ऋण की वसूली के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बाद में वही बैंक इस विवाद में सह-प्रतिवादी के रूप में भी शामिल हो गया। इसी दौरान भारतीय स्टेट बैंक (SBI), ICICI बैंक और अन्य विदेशी बैंकों ने भी अपने-अपने ऋण की वसूली के लिए कानूनी कार्रवाई की। वर्ष 2025 में एसबीआई ने बी.आर. शेट्टी की व्यक्तिगत गारंटी लागू कर लगभग 46 मिलियन डॉलर (करीब ₹405 करोड़) की वसूली की थी।
वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े सार्वजनिक धन के भुगतान और उससे जुड़े आरोपों के मद्देनजर पूरे मामले की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि बैंक ने किन परिस्थितियों में समझौता किया, क्या आंतरिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ और क्या किसी स्तर पर नियामकीय चूक या जवाबदेही का प्रश्न बनता है। इस बीच, बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपने आधिकारिक रुख में दोहराया है कि समझौता केवल लंबी कानूनी लड़ाई समाप्त करने के लिए किया गया है और इसे किसी प्रकार की दोषस्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं, पूरे मामले पर नियामकीय और संस्थागत स्तर पर आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।
