खाद, पेट्रोकेमिकल, लॉजिस्टिक्स और बैंकिंग कंपनियों की हूबहू वेबसाइट तैयार कर B2B कारोबारियों को बनाया निशाना; फर्जी अनुबंध, फ़िशिंग ईमेल और नकली बैंक खातों के जरिए वर्षों तक चलता रहा संगठित धोखाधड़ी का खेल

AI बना वित्तीय धोखाधड़ी का सबसे बड़ा हथियार और सबसे मजबूत सुरक्षा कवच, साइबर अपराधियों व बैंकों के बीच तेज हुई तकनीकी जंग

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) वित्तीय क्षेत्र में दोहरी भूमिका निभा रही है। एक ओर यही तकनीक साइबर अपराधियों को पहले से अधिक विश्वसनीय और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी करने की क्षमता दे रही है, वहीं दूसरी ओर बैंक और वित्तीय संस्थान इसी AI की मदद से संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर धोखाधड़ी को रोकने के लिए उन्नत सुरक्षा प्रणाली विकसित कर रहे हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में वित्तीय धोखाधड़ी और उससे बचाव के बीच प्रतिस्पर्धा पूरी तरह AI आधारित हो जाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जहां साइबर ठगों को किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने के लिए काफी संसाधनों और समय की आवश्यकता होती थी, वहीं अब कुछ सेकंड की ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर AI की मदद से किसी की आवाज की हूबहू नकल तैयार की जा सकती है। इसके जरिए अपराधी बैंक अधिकारियों, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों या सरकारी एजेंसियों का रूप धारण कर लोगों को धोखा देने में सक्षम हो गए हैं।

हाल के वर्षों में दुनिया भर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें AI आधारित वॉयस क्लोनिंग और डीपफेक तकनीक का उपयोग कर कंपनियों से लाखों डॉलर की धोखाधड़ी की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल फोन कॉल ही नहीं, बल्कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म पर भी डीपफेक तकनीक के जरिए भरोसेमंद दिखने वाले नकली अधिकारियों को प्रस्तुत कर वित्तीय लेनदेन की मंजूरी हासिल की जा रही है।

साइबर अपराधी अब जनरेटिव AI का उपयोग कर हजारों लोगों के लिए अलग-अलग भाषाओं और व्यक्तिगत जानकारी के अनुरूप ईमेल, संदेश और फर्जी संचार तैयार कर रहे हैं। इसके साथ ही सिंथेटिक आइडेंटिटी फ्रॉड जैसे अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें वास्तविक और फर्जी पहचान संबंधी सूचनाओं को मिलाकर ऐसी डिजिटल पहचान बनाई जाती है जो पारंपरिक सत्यापन प्रणालियों को भी धोखा दे सकती है।

हालांकि, वित्तीय संस्थान भी AI को अपनी सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहे हैं। पहले जहां धोखाधड़ी की पहचान निश्चित नियमों और तय सीमा से अधिक लेनदेन के आधार पर की जाती थी, वहीं अब AI आधारित सिस्टम प्रत्येक ग्राहक के सामान्य व्यवहार, लेनदेन की आदतों, स्थान, समय और भुगतान के पैटर्न का विश्लेषण कर असामान्य गतिविधियों का स्वतः पता लगा सकते हैं।

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विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई ग्राहक वर्षों से एक ही प्रकार के लेनदेन करता रहा हो और अचानक किसी दूसरे देश या असामान्य समय पर बड़ी राशि का भुगतान करने का प्रयास करे, तो AI आधारित सुरक्षा प्रणाली कुछ ही क्षणों में जोखिम का आकलन कर लेनदेन को रोक सकती है या अतिरिक्त सत्यापन की मांग कर सकती है। इससे वास्तविक धोखाधड़ी की पहचान अधिक सटीक होती है और अनावश्यक अलर्ट की संख्या भी घटती है।

प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि AI ने साइबर अपराधियों को वॉयस क्लोनिंग, डीपफेक और अत्यधिक लक्षित सोशल इंजीनियरिंग हमलों जैसे नए हथियार उपलब्ध करा दिए हैं, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी का जोखिम तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को AI आधारित फ्रॉड डिटेक्शन, व्यवहार विश्लेषण, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और रियल-टाइम रिस्क मॉनिटरिंग जैसी उन्नत तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाना होगा। उनके अनुसार, कर्मचारियों और ग्राहकों में साइबर जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश वित्तीय धोखाधड़ी की शुरुआत सोशल इंजीनियरिंग से होती है।

A Researcher at Algoritha Security ने कहा कि AI ने साइबर अपराध और साइबर सुरक्षा दोनों की गति को कई गुना बढ़ा दिया है। उनके अनुसार, केवल AI आधारित सुरक्षा समाधान अपनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संस्थानों को उच्च गुणवत्ता वाले डेटा, सतत निगरानी, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, कर्मचारी प्रशिक्षण और नियमित सुरक्षा परीक्षण को भी समान महत्व देना होगा। यदि सुरक्षा प्रणाली को विश्वसनीय और अद्यतन डेटा नहीं मिलेगा, तो सबसे उन्नत AI मॉडल भी प्रभावी परिणाम नहीं दे पाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में साइबर अपराधियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा लगातार तेज होगी। जैसे-जैसे बैंक AI आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को मजबूत करेंगे, वैसे-वैसे अपराधी भी नई तकनीकों का उपयोग कर सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का प्रयास करेंगे। ऐसे में वित्तीय संस्थानों और आम नागरिकों दोनों के लिए सतर्कता, निरंतर तकनीकी उन्नयन और साइबर सुरक्षा जागरूकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगी।

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