नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने वित्तीय क्षेत्र में धोखाधड़ी और उससे बचाव, दोनों की तस्वीर तेजी से बदल दी है। जिस तकनीक का उपयोग बैंक और वित्तीय संस्थान संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने, जोखिम का आकलन करने और ग्राहकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कर रहे हैं, उसी तकनीक का इस्तेमाल साइबर अपराधी पहले से कहीं अधिक विश्वसनीय और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम देने में भी कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब वित्तीय धोखाधड़ी केवल तकनीकी चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित हथियारों और सुरक्षा प्रणालियों के बीच लगातार तेज होती प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुकी है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और cyberintelligence.institute के वैज्ञानिक निदेशक प्रो. डॉ. डेनिस-केन्जी किपकर के अनुसार, इतिहास गवाह है कि जहां भी धन रहा है, वहां धोखाधड़ी भी रही है। हालांकि AI ने इस संघर्ष को पूरी तरह बदल दिया है। अब यही तकनीक अपराधियों को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली उपकरण उपलब्ध करा रही है, जबकि दूसरी ओर यही तकनीक वित्तीय संस्थानों को धोखाधड़ी रोकने की नई क्षमता भी दे रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, AI आधारित वॉयस क्लोनिंग आज वित्तीय धोखाधड़ी का सबसे खतरनाक माध्यम बनकर उभरी है। कुछ सेकंड की ऑडियो रिकॉर्डिंग के आधार पर किसी व्यक्ति की आवाज की लगभग सटीक नकल तैयार की जा सकती है। वर्ष 2019 में सामने आए एक चर्चित मामले में अपराधियों ने जर्मनी की एक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी की आवाज की नकल कर ब्रिटेन स्थित सहायक कंपनी के अधिकारी को लगभग 2.40 लाख अमेरिकी डॉलर एक फर्जी खाते में ट्रांसफर करने के लिए राजी कर लिया था। इस घटना ने दिखाया कि केवल आवाज पर भरोसा करना अब सुरक्षित नहीं रह गया है।
इसके बाद जनरेटिव AI ने धोखाधड़ी को और अधिक उन्नत बना दिया। अब अपराधी कई भाषाओं में त्रुटिरहित ईमेल और संदेश तैयार कर सकते हैं, जबकि डीपफेक तकनीक की मदद से नकली वीडियो कॉन्फ्रेंस भी संभव हो गई हैं। वर्ष 2024 की शुरुआत में एक इंजीनियरिंग कंपनी के कर्मचारी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने सहयोगियों और मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) जैसे दिखने वाले लोगों के निर्देश पर लगभग 2.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर के बराबर धनराशि ट्रांसफर कर दी। बाद में पता चला कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाले सभी लोग AI द्वारा तैयार किए गए डीपफेक थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि AI ने वित्तीय धोखाधड़ी की गति और पैमाना दोनों बढ़ा दिए हैं। अब एक अकेला साइबर अपराधी हजारों लोगों के लिए व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर अलग-अलग संदेश तैयार कर सकता है। ये संदेश प्राप्तकर्ता की आदतों, भाषा और व्यवहार के अनुरूप होते हैं, जिससे उनके झांसे में आने की संभावना बढ़ जाती है। इसके साथ ही वास्तविक और काल्पनिक सूचनाओं को मिलाकर तैयार की गई ‘सिंथेटिक पहचान’ (Synthetic Identity) भी वित्तीय संस्थानों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
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हालांकि यही AI वित्तीय संस्थानों की सुरक्षा प्रणाली को भी अधिक प्रभावी बना रहा है। पहले बैंक निश्चित नियमों और निर्धारित सीमा से अधिक लेनदेन होने पर अलर्ट जारी करते थे, जिससे बड़ी संख्या में फर्जी अलर्ट उत्पन्न होते थे और कई वास्तविक धोखाधड़ी के मामले पकड़ में नहीं आते थे। अब AI आधारित व्यवहार विश्लेषण प्रणाली प्रत्येक ग्राहक के सामान्य लेनदेन पैटर्न, स्थान, समय, भुगतान की आदत और अन्य गतिविधियों का अध्ययन कर असामान्य व्यवहार की पहचान करती है। यदि वर्षों से निष्क्रिय खाता अचानक सक्रिय हो जाए या ग्राहक का भुगतान व्यवहार अचानक बदल जाए, तो प्रणाली कुछ ही क्षणों में जोखिम का आकलन कर सकती है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि AI ने साइबर अपराधियों को सोशल इंजीनियरिंग, वॉयस क्लोनिंग और डीपफेक जैसी तकनीकों के जरिए लोगों का विश्वास जीतने की अभूतपूर्व क्षमता दे दी है। ऐसे में केवल तकनीकी सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। प्रत्येक वित्तीय लेनदेन से पहले स्वतंत्र सत्यापन, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, कॉल-बैक वेरिफिकेशन और कर्मचारियों को नियमित साइबर जागरूकता प्रशिक्षण देना अब हर संस्था की प्राथमिक आवश्यकता बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित वित्तीय धोखाधड़ी और उसके बचाव के बीच यह प्रतिस्पर्धा कभी समाप्त नहीं होगी। जैसे-जैसे बैंक नई सुरक्षा तकनीक विकसित करेंगे, अपराधी भी उन्हें चकमा देने के नए तरीके खोजते रहेंगे। ऐसे में संस्थानों को धोखाधड़ी रोकथाम को एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाना होगा, न कि एक बार हल हो जाने वाली समस्या के रूप में।
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि तकनीक चाहे जितनी उन्नत हो जाए, वित्तीय धोखाधड़ी की सबसे बड़ी कमजोरी अब भी मानव व्यवहार ही है। इसलिए किसी भी वित्तीय अनुरोध, भुगतान निर्देश, वीडियो कॉल, ईमेल या फोन कॉल पर आंख बंद कर भरोसा करने के बजाय उसकी स्वतंत्र पुष्टि करना, बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण अपनाना और संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई करना ही साइबर अपराध से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।
