आगरा। प्राकृतिक चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर करोड़ों रुपये का कारोबार कर कराधान से बचने की कोशिश करने वाली एक फर्म के खिलाफ राज्य कर विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। जांच में सामने आया कि फर्म ने नेचुरोपैथी और स्वास्थ्य सुधार कार्यक्रमों के नाम पर महंगी मेंबरशिप और पैकेज बेचकर दो वर्षों में ₹25 करोड़ से अधिक का कारोबार किया, लेकिन उसे पूरी तरह करमुक्त सेवा बताकर सरकार को टैक्स नहीं चुकाया। मामले का खुलासा तब हुआ जब राज्य कर विभाग के अधिकारियों ने खुद ग्राहक बनकर फर्म की गतिविधियों की गुप्त जांच की।
अधिकारियों के अनुसार, “गो नेचर” नाम से संचालित फर्म ने खुद को शत-प्रतिशत करमुक्त स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के रूप में प्रस्तुत किया था। इसी आधार पर फर्म ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग ₹5.15 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2025-26 में ₹20.36 करोड़ से अधिक की सेवाएं प्रदान करने का दावा किया। हालांकि इतनी बड़ी आय के बावजूद कर भुगतान नहीं किए जाने से विभाग को संदेह हुआ और मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई।
FutureCrime Summit Invites OSINT and DFIR Startups to Showcase Their Innovations at Bharat Mandapam
जांच के लिए विशेष रणनीति तैयार की गई। संयुक्त आयुक्त के निर्देशन में गठित टीम ने सीधे छापेमारी करने के बजाय पहले फर्म की कार्यप्रणाली को समझने का फैसला किया। इसके तहत अधिकारियों ने आम ग्राहकों की तरह फर्म से संपर्क किया, विभिन्न सदस्यता योजनाओं में शामिल हुए और उसके वेबिनार तथा वर्कशॉप में भाग लिया। कई दिनों तक चली इस गुप्त पड़ताल के बाद जो तथ्य सामने आए, उन्होंने विभागीय अधिकारियों को भी चौंका दिया।
जांच में पाया गया कि फर्म जिस गतिविधि को प्राकृतिक चिकित्सा या उपचार सेवा बताकर कर छूट का दावा कर रही थी, वह वास्तव में वेलनेस कोचिंग, डाइट प्लानिंग, फिटनेस सलाह और लाइफस्टाइल मॉडिफिकेशन से जुड़ी व्यावसायिक सेवाएं थीं। मौके पर न तो किसी प्रकार का क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट मिला और न ही डॉक्टर तथा मरीज के बीच उपचार संबंधी कोई व्यवस्था दिखाई दी। इसके विपरीत, पूरी व्यवस्था कोच और क्लाइंट मॉडल पर आधारित थी, जहां स्वास्थ्य सुधार के नाम पर विभिन्न स्तर की सदस्यताएं बेची जा रही थीं।
अधिकारियों ने पाया कि ग्राहकों को सिल्वर, गोल्ड और डायमंड जैसी श्रेणियों में बांटकर महंगे पैकेज बेचे जा रहे थे। इन योजनाओं में शामिल लोगों को डाइट चार्ट, ऑनलाइन सलाह, फिटनेस गाइडेंस और जीवनशैली सुधार कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाते थे। विभाग का मानना है कि ऐसी सेवाएं सामान्य स्वास्थ्य और वेलनेस श्रेणी में आती हैं और उन पर लागू कर नियमों का पालन करना आवश्यक है।
जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। करमुक्त स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जहां “बिल ऑफ सप्लाई” जारी किया जाना चाहिए था, वहीं फर्म नियमित रूप से टैक्स इनवॉइस जारी कर रही थी। इससे अधिकारियों का संदेह और गहरा हो गया। जब जांच टीम ने उपचार संबंधी रिकॉर्ड, डॉक्टरों की योग्यता, मरीजों के दस्तावेज और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन प्रस्तुत करने को कहा, तो फर्म के प्रतिनिधि संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
विभाग ने उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि फर्म द्वारा दी जा रही सेवाएं करमुक्त चिकित्सा सेवाओं की श्रेणी में नहीं आतीं। इसके बाद संबंधित कर देनदारी का आकलन किया गया और फर्म को नोटिस जारी किया गया। कार्रवाई की गंभीरता को देखते हुए फर्म संचालकों ने तत्काल ₹1.19 करोड़ की कर राशि जमा करा दी। हालांकि विभाग का कहना है कि यह केवल प्रारंभिक भुगतान है और विस्तृत जांच अभी जारी है।
कर विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला उन व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो स्वास्थ्य, वेलनेस या नेचुरोपैथी के नाम पर सेवाएं देकर कर छूट का लाभ लेने का प्रयास करते हैं। यदि कोई संस्था वास्तविक चिकित्सा उपचार के बजाय केवल कोचिंग, परामर्श या जीवनशैली सुधार कार्यक्रम संचालित कर रही है, तो उसे लागू कर नियमों का पालन करना होगा।
राज्य कर विभाग अब फर्म के वित्तीय लेन-देन, सदस्यता मॉडल और कर रिकॉर्ड की गहन जांच कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद कर चोरी की वास्तविक राशि और संभावित दंडात्मक कार्रवाई का दायरा स्पष्ट हो सकेगा।
