आजमगढ़। मुबारकपुर स्थित मदरसा जामिया नूरुल उलूम की मान्यता से जुड़े विवाद में दस्तावेजी फर्जीवाड़े का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि मदरसे की प्रबंध समिति के दस्तावेजों में झारखंड में तैनात एक मौजूदा जिला जज का नाम सदस्य के तौर पर दर्ज कर दिया गया, जबकि जज का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा है कि समिति के पंजीकरण के लिए उन्होंने अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र किसी को नहीं दिया। मामला सामने आने के बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
मामले में मदरसा शिक्षा परिषद के निर्देश पर जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने प्रबंध समिति से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद 16 लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मुबारकपुर थाने को पत्र भेजा है। हालांकि, थाना प्रभारी के अनुसार अभी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है और प्राप्त पत्र व दस्तावेजों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
फर्जी दानपत्र से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामला मदरसा जामिया नूरुल उलूम की भूमि और भवन से जुड़े अभिलेखों की शिकायत के बाद सामने आया। मुबारकपुर निवासी हाजी अली इमाम ने मदरसे की संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों को लेकर शिकायत की थी। जांच के दौरान आरोप सामने आया कि मदरसे ने वर्ष 1998 में आलिया स्तर की स्थायी मान्यता एक ऐसे दानपत्र के आधार पर हासिल की थी, जिसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठे हैं।
मदरसा प्रबंधन की ओर से प्रस्तुत दानपत्र 20 जून 1997 का बताया गया। इसमें जमीन का पता तहसील मोहम्मदाबाद गोहना, जनपद आजमगढ़ दर्ज था। जांच में यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 1988 में मऊ जिला अस्तित्व में आ चुका था और मोहम्मदाबाद गोहना मऊ जिले का हिस्सा था। ऐसे में वर्ष 1997 के कथित दानपत्र में मोहम्मदाबाद गोहना को आजमगढ़ का हिस्सा दिखाए जाने पर दस्तावेज की प्रामाणिकता को लेकर सवाल खड़े हुए।
मदरसा शिक्षा परिषद की रजिस्ट्रार की ओर से प्रबंधन से स्पष्टीकरण मांगा गया। आरोप है कि प्रबंधन संतोषजनक जवाब देने के साथ मूल दानपत्र भी प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद मदरसे की मान्यता निलंबित कर दी गई।
पुरानी और नई समिति के दस्तावेजों में सामने आए 22 नाम
रजिस्ट्रार के निर्देश के बाद जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने प्रबंध समिति से संबंधित दस्तावेज चिटफंड कार्यालय से प्राप्त किए। जांच में वर्ष 1998 और वर्ष 2024-25 की प्रबंध समितियों से जुड़े कुल 22 नाम सामने आए। इनमें वर्ष 1998 की सूची के 11 नाम और वर्ष 2024-25 की सूची के पांच नए नाम शामिल थे। इन दस्तावेजों के आधार पर कुल 16 लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस को पत्र भेजा गया।
इसी सूची में झारखंड में तैनात एक जिला जज का नाम भी सदस्य के तौर पर दर्ज मिला। नाम सामने आने के बाद जज ने इस पर आपत्ति जताई और अधिकारियों को पत्र भेजकर जांच की मांग की। उनका कहना है कि वर्ष 2002 में एडीजे पद पर चयनित होने के बाद से वह जिले से बाहर सेवाएं दे रहे हैं और मदरसे की प्रबंध समिति से उनका कोई संबंध नहीं रहा।
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‘नाम कैसे दर्ज हुआ, जब दस्तावेज ही नहीं दिए’
जिला जज ने अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा कि उन्हें समिति में अपना नाम दर्ज किए जाने की जानकारी नहीं थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उन्होंने आधार कार्ड, पैन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र जैसे पहचान संबंधी दस्तावेज किसी को उपलब्ध नहीं कराए, तो सोसायटी या समिति के पंजीकरण के दौरान उनके नाम का सत्यापन किस आधार पर किया गया।
जज ने यह भी बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि उनके एक दूर के रिश्तेदार ने उनका नाम प्रबंध समिति में दर्ज कराया था। उन्होंने मदरसा शिक्षा परिषद की रजिस्ट्रार, पुलिस अधीक्षक आजमगढ़ और जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को पत्र भेजकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने का अनुरोध किया है।
प्राथमिकी को लेकर विभाग और पुलिस के बयान अलग
जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के अनुसार, रजिस्ट्रार के निर्देश पर चिटफंड कार्यालय से प्रबंध समिति के दस्तावेज जुटाए गए। इनमें दर्ज पदाधिकारियों और सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मुबारकपुर थाने में तहरीर भेजी गई है।
वहीं, मुबारकपुर थाना प्रभारी का कहना है कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के पटल सहायक की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ है। उनके अनुसार यह पत्र मामले की जांच के लिए है, प्राथमिकी दर्ज करने की तहरीर नहीं। पुलिस दस्तावेजों और तथ्यों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई करेगी।
अब जांच का केंद्र प्रबंध समिति के दस्तावेज, सोसायटी पंजीकरण की प्रक्रिया और उसमें जिला जज का नाम दर्ज किए जाने का आधार है। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि समिति के रिकॉर्ड में नाम किसने और किन दस्तावेजों के आधार पर दर्ज कराया। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित फर्जीवाड़े के लिए कौन जिम्मेदार है और मदरसे की मान्यता से जुड़े दस्तावेजों में किस स्तर पर अनियमितता हुई।
