स्वतंत्र ऑडिट में खरीदारों की रकम दूसरी जगह लगाए जाने की बात सामने आई; हाईकोर्ट ने कहा- बड़े पैमाने के आर्थिक अपराधों से सख्ती से निपटना जरूरी, मुकदमे में देरी का भी लिया संज्ञान

₹126.30 करोड़ के घर खरीदारों के धन के कथित डायवर्जन का मामला, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीएमएलए में जमानत खारिज की

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By Roopa
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने घर खरीदारों से जुटाई गई 126.30 करोड़ रुपये की रकम के कथित डायवर्जन और धन शोधन के मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस कृष्ण पहल की एकल पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जमानत पाने का हकदार नहीं है। अदालत ने स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट में खरीदारों की रकम दूसरी जगह लगाए जाने की बात सामने आने और मुकदमे की कार्यवाही में देरी से जुड़े तथ्यों को भी महत्वपूर्ण माना।

यह मामला प्रवर्तन निदेशालय की ओर से 23 दिसंबर 2024 को दर्ज धन शोधन मामले से जुड़ा है। इसका आधार लखनऊ में 24 नवंबर 2022 को दर्ज मूल प्राथमिकी है, जिसमें आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे। इसके अलावा गौतमबुद्ध नगर में भी धोखाधड़ी से संबंधित चार अन्य प्राथमिकी दर्ज की गई थीं।

जांच एजेंसी के अनुसार, ‘अरण्य’ परियोजना में 1,468 इकाइयों के लिए घर खरीदारों से करीब 522.90 करोड़ रुपये जुटाए गए थे, लेकिन केवल 35 खरीदारों को कब्जा दिया गया। एक स्वतंत्र ऑडिट में शुरुआत में करीब 107 करोड़ रुपये की रकम के डायवर्जन का पता चला। बाद की जांच में 126.30 करोड़ रुपये को निवेशकों और घर खरीदारों से जुटाई गई रकम बताते हुए उसके दूसरी जगह इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाया गया।

जांच पूरी करने के बाद एजेंसी ने 13 जून 2025 को विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की। इसमें छह अनुसूचित अपराधों का उल्लेख किया गया था। विशेष अदालत ने 18 अगस्त 2025 को शिकायत पर संज्ञान लिया।

जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने मामले को अस्पष्ट और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल उठाया। दलील दी गई कि गिरफ्तारी के दौरान संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों में विरोधाभास हैं और बाद में दाखिल अभियोजन शिकायत में एक अतिरिक्त अपराध जोड़ा गया।

बचाव पक्ष के अनुसार, परियोजना को किसानों से जुड़े भूमि विवाद, दीवानी मुकदमों और निर्माण पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण की रोक के कारण वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसी वजह से कंपनी की प्रबंधन प्रक्रिया में भी बदलाव हुआ था। दलील दी गई कि जिस रकम को डायवर्जन बताया जा रहा है, वह प्रमोटर का अंशदान, अंतर-कॉरपोरेट ऋण, संस्थागत उधारी या सुरक्षा जमा थी।

Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise

आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि कंपनी को खरीदारों से करीब 500 करोड़ रुपये मिले थे, जबकि निर्माण पर लगभग 670 करोड़ रुपये खर्च किए गए। बचाव पक्ष ने जांच में सहयोग करने और लंबे समय से हिरासत में होने का हवाला देते हुए जमानत की मांग की। स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानी का भी उल्लेख किया गया।

वहीं, जांच एजेंसी ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि वित्तीय जांच में 126.30 करोड़ रुपये की रकम को इक्विटी निवेश, डिबेंचर, बॉन्ड, तरजीही शेयरों और संबंधित कंपनियों को दिए गए ऋण व अग्रिम के जरिए दूसरी जगह लगाए जाने के संकेत मिले हैं। इसमें करीब 88 करोड़ रुपये का ऐसा अग्रिम भी शामिल बताया गया, जिसे बाद में कंपनी के खातों में वसूल न होने वाली रकम के रूप में दिखाया गया।

जांच एजेंसी ने आरोपी के खिलाफ नौ मामलों के आपराधिक इतिहास का भी हवाला दिया। इनमें धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और जालसाजी से संबंधित आरोप शामिल बताए गए। एक मामले में एक ही फ्लैट को कई लोगों को बेचने का आरोप भी सामने रखा गया। एजेंसी ने फरार होने की आशंका जताते हुए एक पुराने मामले में शुरू की गई कानूनी कार्रवाई का भी उल्लेख किया।

हाईकोर्ट ने मुकदमे की स्थिति जानने के लिए निचली अदालत से रिपोर्ट मंगाई थी। 14 अगस्त 2026 की ट्रायल स्टेटस रिपोर्ट में सामने आया कि कई तारीखों पर आरोपी अदालत में मौजूद रहा, जबकि उसके वकील कुछ मौकों पर अनुपस्थित रहे। अदालत को यह भी बताया गया कि आरोप तय किए जाने को लेकर बहस 30 जुलाई 2026 को पूरी हो चुकी थी और आगे की कार्यवाही के लिए मामला तय था।

अदालत ने बड़े पैमाने पर होने वाले आर्थिक अपराधों के प्रभाव पर भी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि सफेदपोश अपराध व्यापक स्तर पर लोगों की जीवनभर की बचत, पेंशन और आजीविका को प्रभावित कर सकते हैं और ऐसे मामलों से प्रभावी तथा कड़े तरीके से निपटने की जरूरत है। अदालत ने यह भी कहा कि आर्थिक अपराधों में जिम्मेदारी तय करने और अपराध से जुड़ी संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि यदि कोई कानूनी बाधा नहीं हो तो दोनों पक्षों को अनावश्यक स्थगन दिए बिना लंबित मुकदमे का कानून के अनुसार जल्द निस्तारण किया जाए।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के सवाल तक सीमित हैं और मुकदमे की सुनवाई के दौरान मामले के अंतिम गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी।

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