नई दिल्ली। एलपीजी सिलेंडर उठाने में महिला को असमर्थ मानकर नौकरी से वंचित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड को प्रभावित महिला को ₹12 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है। मामला एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर के पद पर नियुक्ति से जुड़ा है। महिला संबंधित पद के लिए योग्य थी, लेकिन उसकी नियुक्ति यह मानते हुए रोक दी गई कि महिला होने के कारण वह एलपीजी सिलेंडर उठाने जैसे शारीरिक श्रम वाले काम को नहीं कर पाएगी।
अदालत ने इस सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी उम्मीदवार की शारीरिक क्षमता का आकलन केवल उसके महिला होने के आधार पर नहीं किया जा सकता। महिला को किसी काम के लिए पहले से अक्षम मान लेना उसकी गरिमा और सम्मान के खिलाफ है।
महिला होने के आधार पर नौकरी से किया गया इनकार
मामले में सामने आया कि महिला ने एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह इस पद के लिए योग्य थी, लेकिन नियुक्ति के स्तर पर उसके महिला होने को आधार बनाकर उसकी शारीरिक क्षमता पर सवाल उठाया गया। यह मान लिया गया कि वह एलपीजी सिलेंडर उठाने में सक्षम नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी धारणा को मामले का अहम पहलू माना। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ महिला होने के कारण किसी उम्मीदवार को यह मानकर अयोग्य ठहराया जा सकता है कि वह सिलेंडर नहीं उठा पाएगी। अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन वास्तविक शारीरिक योग्यता और पद के लिए तय मानकों के आधार पर होना चाहिए।
अदालत ने माना कि लिंग के आधार पर किसी महिला की क्षमता के बारे में पहले से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। ऐसी सोच महिलाओं की गरिमा को प्रभावित करती है और उन्हें रोजगार के समान अवसर से वंचित कर सकती है।
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नौकरी की जगह ₹12 लाख मुआवजा क्यों?
मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तब तक महिला संबंधित पद पर नियुक्ति की उम्र पार कर चुकी थीं और सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच चुकी थीं। ऐसी स्थिति में अब उन्हें उसी पद पर नियुक्त करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था।
इसी वजह से अदालत ने नौकरी देने के बजाय आर्थिक मुआवजे का रास्ता अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेशन को महिला को ₹12 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया। यह राशि उस रोजगार अवसर से वंचित किए जाने के नुकसान की भरपाई के तौर पर दी जाएगी, जिससे महिला को लिंग आधारित धारणा के कारण दूर रखा गया था।
क्षमता का फैसला लिंग के आधार पर नहीं
फैसले में अदालत की टिप्पणी का व्यापक महत्व है। शारीरिक श्रम वाले किसी पद के लिए यदि विशेष क्षमता जरूरी है तो उस क्षमता को मापने के लिए स्पष्ट और समान मानक होने चाहिए। किसी उम्मीदवार को सिर्फ महिला होने के कारण उस काम के लिए अयोग्य मान लेना इन मानकों का विकल्प नहीं हो सकता।
मामले में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि महिला या पुरुष होने के आधार पर काम करने की क्षमता के बारे में सामान्य धारणा नहीं बनाई जा सकती। यदि किसी पद के लिए सिलेंडर उठाने या अन्य शारीरिक गतिविधि की आवश्यकता है तो उम्मीदवार की वास्तविक क्षमता का परीक्षण किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रोजगार में लिंग आधारित पूर्वधारणाओं के सवाल को भी सामने लाता है। अदालत के आदेश के बाद प्रभावित महिला को उस नौकरी के अवसर के नुकसान के लिए ₹12 लाख की आर्थिक भरपाई मिलेगी, जिसे वह लंबे समय पहले हासिल कर सकती थीं, लेकिन महिला होने के आधार पर उनकी क्षमता पर सवाल उठाकर नियुक्ति रोक दी गई थी।
