मुंबई में 72 वर्षीय बुजुर्ग को कथित डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 10 दिनों तक दबाव में रखकर करीब ₹90 लाख ट्रांसफर कराने का मामला सामने आया है।

₹90 लाख की डिजिटल अरेस्ट ठगी, 72 वर्षीय बुजुर्ग को 10 दिन तक हर दो घंटे में लोकेशन बताने को कहा

Team The420
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मुंबई। मलाड वेस्ट में रहने वाले 72 वर्षीय बुजुर्ग से कथित डिजिटल अरेस्ट के नाम पर करीब ₹90 लाख की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। ठगों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताकर बुजुर्ग को करीब 10 दिनों तक वीडियो कॉल और फोन के जरिए निगरानी में रखा। इस दौरान उन्हें हर दो घंटे में अपनी लोकेशन बताने को कहा गया। आरोपियों ने दावा किया कि उनके बैंक खाते और मोबाइल नंबर प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़े लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं और वह करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेनदेन में फंस गए हैं।

पुलिस के अनुसार, बुजुर्ग मलाड वेस्ट में पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे के साथ रहते हैं। परिवार की आय मुख्य रूप से उनकी बेटी की नौकरी और सावधि जमा से मिलने वाले ब्याज पर निर्भर है। 28 अगस्त को उन्हें वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने पुलिस की वर्दी पहन रखी थी और खुद को नासिक का अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बताया। उसने कहा कि बुजुर्ग के डेबिट कार्ड का दुरुपयोग हुआ है और उससे करोड़ों रुपये के लेनदेन किए गए हैं। इसके आधार पर उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने का दावा किया गया और उन्हें नासिक के पंचवटी पुलिस थाने में पेश होने को कहा गया।

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अगले दिन एक अन्य व्यक्ति ने फोन कर खुद को पंचवटी पुलिस थाने का अधिकारी बताया। उसने बुजुर्ग को कई दस्तावेज भेजे, जिनमें प्रतिबंधित संगठन के लेटरहेड वाला कथित पत्र और कुछ लोगों की तस्वीरें शामिल थीं। आरोपियों ने दावा किया कि बुजुर्ग को बैंक लेनदेन में 20 प्रतिशत कमीशन मिला है। भरोसा पैदा करने और डर बढ़ाने के लिए उन्हें 20 कथित फर्जी शिकायतें भी भेजी गईं।

ठगों ने इसके बाद कथित तौर पर उच्चतम न्यायालय के फर्जी दस्तावेज भेजे। इनमें बुजुर्ग पर मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद से जुड़े आरोप लगाए गए थे। उन्हें बताया गया कि उनका मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। आरोपियों ने दबाव बनाए रखने के लिए उनसे एक गोपनीयता समझौते पर हस्ताक्षर भी कराए। इसके बाद उन्हें किसी से इस मामले की जानकारी साझा नहीं करने के लिए कहा गया।

आरोपियों ने बुजुर्ग से उनकी बचत, निवेश और अन्य वित्तीय संसाधनों की जानकारी भी ली। उन्हें निर्देश दिया गया कि 31 अगस्त तक अपने सभी निवेश को भुना लें और रकम उन बैंक खातों में भेजें, जिनका विवरण प्रवर्तन निदेशालय और भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से भेजे गए कथित फर्जी पत्रों में दिया गया था। पुलिस के अनुसार, बुजुर्ग ने आरोपियों के निर्देश पर करीब ₹90 लाख अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए।

करीब ₹90 लाख हासिल करने के बाद भी आरोपियों की मांग नहीं रुकी। उन्होंने बुजुर्ग से अतिरिक्त ₹40 लाख मांगे और रकम नहीं देने पर गिरफ्तार कर जेल भेजने की धमकी दी। उन्हें सात साल तक की सजा होने का डर दिखाया गया। लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए निगरानी के कारण बुजुर्ग कई दिनों तक आरोपियों के दबाव में रहे।

बाद में जब आरोपियों के सभी मोबाइल नंबर अचानक बंद हो गए, तब बुजुर्ग को ठगी का एहसास हुआ। उन्होंने परिवार को घटना की जानकारी दी और साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। ठगी में इस्तेमाल बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और फर्जी दस्तावेजों की जांच की जा रही है।

डिजिटल अरेस्ट के ऐसे मामलों में ठग पुलिस, जांच एजेंसी या अदालत के अधिकारी बनकर पीड़ित को गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। फर्जी वर्दी, वीडियो कॉल, दस्तावेज और लगातार निगरानी के जरिए दबाव बनाया जाता है। इसके बाद पीड़ित से बैंक खाते खाली कराने या रकम दूसरे खातों में भेजने के लिए कहा जाता है। वास्तविक जांच प्रक्रिया में किसी व्यक्ति को इस तरह वीडियो कॉल के जरिए कई दिनों तक निगरानी में रखकर निवेश की रकम किसी खाते में जमा कराने का प्रावधान नहीं है।

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