नई दिल्ली। साइबर फ्रॉड और मनी-म्यूल खातों से जुड़े मामलों में खाताधारकों को बड़ी राहत मिल सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने ऐसे मामलों में पूरे बैंक खाते को फ्रीज करने के बजाय केवल उस रकम पर अस्थायी रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है, जिस पर साइबर ठगी या संदिग्ध लेनदेन से जुड़े होने का संदेह है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर खाते में मौजूद बाकी वैध रकम और सामान्य बैंकिंग गतिविधियां जारी रह सकेंगी।
आरबीआई के प्रस्ताव के मुताबिक, अगर किसी खाते में 1,000 रुपये या उससे अधिक का असामान्य लेनदेन उसे मनी-म्यूल गतिविधि या साइबर फ्रॉड से जुड़ा हुआ दिखाता है, तो बैंक संबंधित रकम पर अस्थायी रोक लगा सकेंगे। मनी-म्यूल ऐसे खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल ठगी या अन्य अपराध से हासिल रकम को प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए किया जाता है। नए ढांचे का उद्देश्य संदिग्ध रकम को सुरक्षित रखने के साथ ऐसे ग्राहकों को राहत देना है, जिनके पूरे खाते पर रोक लग जाने से उनकी वैध बैंकिंग गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
एआई से पकड़े जाएंगे संदिग्ध लेनदेन
प्रस्तावित व्यवस्था में बैंकों को संदिग्ध लेनदेन की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल करना होगा। यह प्रणाली ग्राहक की सामान्य लेनदेन गतिविधियों का विश्लेषण कर अचानक होने वाले असामान्य लेनदेन की पहचान करेगी। ऐसे लेनदेन पर भी नजर रखी जाएगी, जो ग्राहक की घोषित आय या प्रोफाइल की तुलना में बहुत अधिक हों।
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इसके अलावा पहले से पहचाने गए साइबर फ्रॉड नेटवर्क से जुड़े खातों या लेनदेन को भी निगरानी में रखा जाएगा। इस तरह बैंक केवल किसी एक लेनदेन को अलग से देखने के बजाय ग्राहक की सामान्य गतिविधियों, रकम के आकार और संदिग्ध नेटवर्क से संभावित संबंध को ध्यान में रखकर कार्रवाई कर सकेंगे।
ग्राहक को 20 दिन में देना होगा जवाब
नए प्रस्ताव में ग्राहक के लिए भी स्पष्ट प्रक्रिया तय की गई है। यदि किसी रकम पर अस्थायी रोक लगाई जाती है, तो बैंक ग्राहक को उसकी वैधता स्पष्ट करने के लिए 20 कैलेंडर दिन का समय देंगे। ग्राहक इस दौरान अपनी पहचान, लेनदेन का उद्देश्य और रकम के स्रोत से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध करा सकेगा।
ग्राहक की ओर से जवाब मिलने के बाद बैंक को उसकी सफाई और दस्तावेजों की जांच के लिए 10 कैलेंडर दिन का समय मिलेगा। यदि जांच में लेनदेन वैध पाया जाता है और साइबर फ्रॉड का संदेह दूर हो जाता है, तो बैंक को संबंधित रकम पर लगी रोक तुरंत हटानी होगी। इससे लंबे समय तक बिना स्पष्ट कारण रकम के इस्तेमाल से वंचित रहने की स्थिति कम हो सकती है।
जवाब नहीं मिला तो पुलिस को भेजा जाएगा मामला
यदि ग्राहक 20 दिन के भीतर जवाब नहीं देता या उपलब्ध कराई गई जानकारी से साइबर फ्रॉड का संदेह दूर नहीं होता, तो बैंक मामले को संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसी के पास भेजेगा। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और केंद्रीय वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा।
मामला पुलिस या संबंधित जांच एजेंसी को भेजे जाने के बाद बैंक अपने स्तर पर रकम को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकेगा। पुलिस को रेफरल मिलने के 30 दिनों के भीतर औपचारिक वैधानिक रोक जारी करनी होगी। इसके बाद संदिग्ध रकम पर आगे की कानूनी कार्रवाई कानून प्रवर्तन एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में होगी।
1 अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव
आरबीआई ने प्रस्तावित बदलाव सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जारी किए हैं। नए निर्देश 1 अप्रैल 2027 से लागू किए जाने का प्रस्ताव है। हालांकि, बैंक चाहें तो इन्हें इससे पहले भी अपना सकते हैं। प्रस्तावित बदलाव केवाईसी निर्देश, 2025 के तहत बैंक खातों के संचालन और मनी-म्यूल खातों से जुड़े मौजूदा प्रावधानों में संशोधन करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तैयार हुआ प्रस्ताव
आरबीआई के अनुसार, यह प्रस्ताव 4 अगस्त 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तैयार किया गया है। शीर्ष अदालत ने आरबीआई को मनी-म्यूल गतिविधियों और साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से जुड़ी रकम या खातों पर अस्थायी डेबिट रोक लगाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार कर जारी करने का निर्देश दिया था।
पूरे खाते पर रोक की जगह लक्षित कार्रवाई
प्रस्तावित फ्रेमवर्क का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि साइबर फ्रॉड के संदेह में कार्रवाई को पूरे खाते के बजाय संदिग्ध रकम तक सीमित किया जाएगा। इससे एक तरफ ठगी से जुड़ी रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी तरफ खाताधारक अपनी वैध रकम का इस्तेमाल कर सकेगा। बैंक और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच संदिग्ध रकम की पहचान, ग्राहक की सफाई, बैंक की जांच और पुलिस कार्रवाई के लिए अलग-अलग समयसीमा तय होने से पूरी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और जवाबदेह बनाने की कोशिश की गई है।
