प्रयागराज। नोएडा में मजदूरों के आंदोलन से जुड़े मामले में करीब पांच महीने से हिरासत में चल रही दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास स्नातक आकृति चौधरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई निरुद्धि को रद्द कर दिया है। साथ ही ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा की जाए।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश मामले को “मनगढ़ंत कहानी” पर आधारित बताया। पीठ ने कहा कि यदि किसी अन्य मामले में आकृति की गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। हालांकि, आंदोलन से जुड़े अन्य मामलों में जमानत नहीं मिलने की स्थिति में उनकी वास्तविक रिहाई उन मामलों की कानूनी स्थिति पर निर्भर करेगी।
पुलिस के आरोपों और NSA कार्रवाई पर सवाल
आकृति चौधरी को अप्रैल में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप था कि वेतन वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान उन्होंने मजदूरों को भड़काने का प्रयास किया। पुलिस के मुताबिक, इसके बाद प्रदर्शन के दौरान हिंसा, पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं। बाद में 13 मई को आकृति चौधरी और सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई की गई।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि आकृति के खिलाफ निरोधात्मक कार्रवाई को सही ठहराने के लिए उसके पास क्या ठोस सामग्री है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या कोई ऐसा वीडियो या अन्य प्रमाण मौजूद है, जिसमें आकृति प्रदर्शनकारियों को पथराव या वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाती दिखाई दे रही हों।
अदालत ने गिरफ्तारी से पहले अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। राज्य सरकार ने बताया कि आकृति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया था। इस पर पीठ ने पूछा कि क्या इससे पहले धारा 126 के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी की गई थी। राज्य ने स्वीकार किया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।
इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्यों पर भी सवाल
आकृति की गिरफ्तारी के समय पुलिस ने उनके खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य होने का दावा किया था। बाद की सुनवाई में हाईकोर्ट ने इन दावों से जुड़े दस्तावेज और वीडियो सामग्री पेश करने तथा उनके आधार पर स्पष्टीकरण देने को कहा।
पीठ ने यह जानने की कोशिश की कि उपलब्ध वीडियो में क्या आकृति वास्तव में प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाती दिखाई दे रही हैं। राज्य सरकार ने गवाहों के बयानों का भी हवाला दिया, लेकिन अदालत ने कथित उकसावे को साबित करने वाली प्रत्यक्ष वीडियो सामग्री को लेकर सवाल किए। इससे यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया कि NSA जैसी निरोधात्मक कार्रवाई के लिए पेश सामग्री वास्तव में हिरासत को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त थी या नहीं।
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आकृति के वकीलों ने कार्रवाई को दी थी चुनौती
आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की स्नातक हैं और मजदूर आंदोलन के दौरान प्रदर्शन में शामिल हुई थीं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस और अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने अदालत में पैरवी की। याचिका में NSA के तहत निरुद्धि को चुनौती देते हुए उनके वकीलों ने तर्क दिया कि आकृति आंदोलन की आयोजक नहीं थीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मजदूरों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुई थीं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद आकृति की NSA के तहत निरुद्धि का कानूनी आधार समाप्त हो गया है। हालांकि, आंदोलन से जुड़े अन्य आपराधिक मामलों में यदि उनकी गिरफ्तारी या हिरासत कानूनी रूप से जारी रहती है तो उन्हें उन मामलों में राहत मिलने तक जेल में रहना पड़ सकता है।
मुआवजे के आदेश ने बढ़ाई प्रशासनिक जवाबदेही
हाईकोर्ट का ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश इस मामले का अहम हिस्सा है। अदालत ने राशि जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा करने को कहा है। इससे निरोधात्मक कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठे हैं।
अदालत के विस्तृत आदेश से यह स्पष्ट होगा कि NSA के तहत निरुद्धि की प्रक्रिया में किन कानूनी और प्रक्रियात्मक कमियों को अदालत ने निर्णायक माना। साथ ही यह भी सामने आएगा कि निरोधात्मक हिरासत को सही ठहराने के लिए राज्य की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों को अदालत ने किस आधार पर अपर्याप्त माना।
