74 वर्षीय सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी और उनकी पत्नी को आतंकवाद से जोड़कर डराया; फर्जी नोटिस भेजे, बैंक खातों और संपत्ति की जानकारी ली, RBI सत्यापन के नाम पर कराए दो ट्रांसफर

रेड फोर्ट ब्लास्ट का डर दिखाया, फर्जी NIA-ATS अधिकारियों ने 7 दिन में लूट लिए ₹30 लाख

Roopa
By Roopa
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नई दिल्ली। राजधानी में साइबर ठगों ने रेड फोर्ट विस्फोट का डर दिखाकर 74 वर्षीय सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी और उनकी पत्नी को सात दिनों तक डिजिटल गिरफ्तारी में रखा और करीब ₹30 लाख ठग लिए। आरोपियों ने खुद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) का अधिकारी बताया। उन्होंने बुजुर्ग को धमकाया कि उनका बैंक खाता रेड फोर्ट विस्फोट में शामिल आतंकियों को पैसा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल हुआ है। पुलिस ने जांच के दौरान ₹12 लाख बरामद कर लिए हैं और मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार किया है।

पुलिस के अनुसार, ठगों ने हालिया आतंकी घटना को अपने जाल का आधार बनाया। 10 नवंबर 2025 को रेड फोर्ट में हुए कार विस्फोट में 13 लोगों की मौत के बाद घटना की जांच चर्चा में थी। इसी माहौल का फायदा उठाकर जालसाजों ने पीड़ित को विश्वास दिलाया कि वह आतंकवाद से जुड़े गंभीर मामले में फंस चुके हैं।

शादी में जाने से पहले आया फर्जी NIA अधिकारी का फोन

घटना 23 नवंबर 2025 की है। सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी एक रिश्तेदार की शादी में जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी शाम करीब चार बजे उनके मोबाइल पर फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को NIA अधिकारी बताया और दावा किया कि पीड़ित रेड फोर्ट हमले को आर्थिक मदद दे रहे हैं।

अचानक लगे इस आरोप से बुजुर्ग घबरा गए। अगले दिन एक व्यक्ति ने वीडियो कॉल पर खुद को NIA अधिकारी बताया, जबकि दूसरे ने ATS अधिकारी होने का दावा किया। दोनों ने कहा कि जांच एजेंसियों ने पीड़ित के खिलाफ नोटिस जारी किए हैं और उनका संबंध उमर नबी तथा विस्फोट में शामिल अन्य आरोपियों के खातों से है।

ठगों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अगर उन्होंने निर्देशों का पालन नहीं किया तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने घर पहुंच जाएगी। इसके बाद दंपती को डिजिटल गिरफ्तारी में रखने का सिलसिला शुरू हो गया।

NIA, ATS और सुप्रीम कोर्ट के नाम से भेजे फर्जी नोटिस

पुलिस के मुताबिक, 25 नवंबर को आरोपियों ने NIA, ATS और सुप्रीम कोर्ट के नाम और लोगो वाले कथित नोटिस WhatsApp पर भेजे। इसके बाद पीड़ित से एक ‘गोपनीयता समझौते’ पर हस्ताक्षर भी कराए गए।

इस समझौते के जरिए उन्हें निर्देश दिया गया कि वह कथित जांच के बारे में किसी को जानकारी न दें, यहां तक कि अपने बेटे और बेटी को भी नहीं। दंपती अकेले रहते थे और उनके बच्चे दूसरे शहरों में रहते थे। ठगों ने इसी स्थिति का फायदा उठाकर उन्हें परिवार और बाहरी दुनिया से संपर्क करने से रोक दिया।

बैंक खाते, FD और संपत्ति का पूरा ब्योरा मांगा

सात दिनों तक जालसाज लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए दंपती पर नजर रखते रहे। पुलिस के अनुसार, इस दौरान उनसे बैंक खातों, सावधि जमा, संपत्ति और अन्य वित्तीय संसाधनों की पूरी जानकारी हासिल की गई।

साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी Prof. Triveni Singh के मुताबिक, डिजिटल गिरफ्तारी जैसे मामलों में अपराधी पहले पीड़ित को किसी गंभीर अपराध से जोड़कर भय पैदा करते हैं। इसके बाद उसे परिवार से अलग कर लगातार मानसिक दबाव में रखा जाता है, जिससे वह बिना स्वतंत्र सत्यापन के ठगों के निर्देशों का पालन करने लगता है।

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RBI सत्यापन के नाम पर मांगे ₹30 लाख

3 दिसंबर को ठगों ने बुजुर्ग से कहा कि कथित जांच पूरी हो चुकी है और अब केवल उनके पैसों के स्रोत का सत्यापन किया जाना बाकी है। आरोपियों ने दावा किया कि उन्हें ₹15 लाख RBI से स्वीकृत खाते में जमा करने होंगे। उन्होंने कहा कि बैंक सत्यापन पूरा होने के बाद रकम वापस कर दी जाएगी।

पीड़ित ने अपनी सावधि जमा तोड़ी और ₹30 लाख निकाल लिए। उसी दिन उन्होंने ₹15 लाख आरोपियों द्वारा बताए गए खाते में भेज दिए। अगले दिन फिर ₹15 लाख की मांग की गई। ठगों ने कहा कि यह राशि उस धन के स्रोत के पूर्ण सत्यापन के लिए जरूरी है, जिससे सावधि जमा बनाई गई थी। पीड़ित ने दूसरी रकम भी भेज दी।

इसके बाद उसे RBI के नाम से एक कथित सत्यापन पत्र मिला, जिस पर राज्यपाल की मुहर होने का दावा किया गया था। पत्र मिलने के बाद आरोपियों ने संपर्क बंद कर दिया। तब पीड़ित को समझ आया कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुका है।

एक बैंक खाते ने खोली ठगी के नेटवर्क की कड़ी

मामला दर्ज होने के बाद जांच अपराध शाखा को सौंप दी गई। पुलिस ने दोनों लेनदेन से जुड़े बैंक खातों और धन के आगे के प्रवाह की जांच शुरू की। करीब छह महीने बाद मई में जांचकर्ताओं को महत्वपूर्ण सुराग मिला।

पुलिस के मुताबिक, पीड़ित की ओर से किए गए RTGS लेनदेन में से एक की रकम शुरुआत में Shri Balaji Tractor नाम की वास्तविक कंपनी के बैंक खाते में पहुंची थी। यह खाता सुनील सिंगला के नाम पर दर्ज था।

जांच में सामने आया कि सिंगला के खाते का इस्तेमाल छह से अधिक साइबर ठगी के मामलों में हुआ था। पुलिस के अनुसार, रेड फोर्ट विस्फोट के बाद से करीब ₹1 करोड़ की रकम इस खाते से होकर गुजरी थी।

हरियाणा के फतेहाबाद निवासी सुनील सिंगला को 11 मई को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उसने कथित तौर पर बताया कि वह अपना कारोबार बढ़ाने के लिए ऑनलाइन ऋण की तलाश कर रहा था। इसी दौरान एक व्यक्ति ने उससे संपर्क किया और बड़े वित्तीय लेनदेन के लिए बैंक खाता उपलब्ध कराने के बदले कमीशन देने की पेशकश की।

₹12 लाख बचाने में सफल रही पुलिस

पुलिस के मुताबिक, पीड़ित द्वारा पहली बार भेजे गए ₹15 लाख में से केवल ₹3 लाख ही आगे दूसरे खातों में भेजे जा सके थे। बाकी ₹12 लाख रकम खाते में उपलब्ध थी, जिसे पुलिस ने रोककर बरामद कर लिया।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क में और कितने लोग शामिल थे, फर्जी NIA और ATS पहचान का इस्तेमाल किस स्तर पर किया गया और पीड़ित से ठगी गई रकम को किन-किन खातों में भेजा गया। मामला यह भी दिखाता है कि साइबर ठग वास्तविक आतंकी घटनाओं और सरकारी एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल कर लोगों में डर पैदा कर रहे हैं।

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