हैदराबाद: हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने WhatsApp पर साड़ी दुकान के मालिक की कथित पहचान बनाकर उसके अकाउंटेंट से ₹1 करोड़ ट्रांसफर कराने के मामले में 37 वर्षीय एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, ठगी की रकम को कथित तौर पर एक कॉरपोरेट करंट अकाउंट के जरिए आगे भेजा गया था। त्वरित जांच, वित्तीय लेनदेन की निगरानी और अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने ठगी की पूरी ₹1 करोड़ की रकम 10 दिनों के भीतर सुरक्षित कर पीड़ित को वापस कर दी।
जांच के अनुसार, साइबर ठगों ने WhatsApp पर साड़ी दुकान के मालिक के नाम और उसकी डिस्प्ले तस्वीर का इस्तेमाल कर ऐसा प्रोफाइल तैयार किया, जिससे अकाउंटेंट को संदेश वास्तविक मालिक की ओर से भेजे जाने का भरोसा हो। इसके बाद कथित तौर पर अकाउंटेंट को संदेश भेजकर तत्काल बड़ी रकम ट्रांसफर करने के लिए कहा गया।
संदेश को वास्तविक मानते हुए अकाउंटेंट ने कथित तौर पर WhatsApp पर बताए गए बैंक खाते में ₹1 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। लेनदेन की जानकारी मिलने के बाद मामला साइबर क्राइम पुलिस तक पहुंचा। इसके बाद जांचकर्ताओं ने रकम की आवाजाही का पता लगाने के साथ उस बैंक खाते और उससे जुड़े लोगों की जानकारी जुटानी शुरू की।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ₹1 करोड़ की रकम Royal Moda Pvt Ltd के नाम से संचालित एक कॉरपोरेट करंट अकाउंट के जरिए भेजी गई थी। जांचकर्ताओं को संदेह है कि इस खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी से हासिल रकम प्राप्त करने और उसे आगे दूसरे खातों में भेजने के लिए म्यूल अकाउंट के तौर पर किया जा रहा था।
वित्तीय लेनदेन और अन्य जांच सुरागों के आधार पर पुलिस उत्तर प्रदेश के लखनऊ पहुंची। वहां 37 वर्षीय दीपक कुमार की पहचान मामले में संदिग्ध के रूप में हुई। लखनऊ निवासी दीपक कथित तौर पर पानी के प्लांट का कारोबार करता है। पुलिस ने उसे मामले में गिरफ्तार कर लिया और लखनऊ की अदालत में पेश किया।
पुलिस ने लखनऊ की अदालत से ट्रांजिट रिमांड हासिल की और आरोपी को आगे की जांच के लिए साइबराबाद लाया गया। इसके बाद उसे साइबराबाद के कुकटपल्ली स्थित IX Additional Metropolitan Magistrate की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पुलिस के अनुसार, रकम के वित्तीय प्रवाह का तेजी से पता लगाने और समय पर कानूनी कार्रवाई होने से ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने में मदद मिली। अदालत के आदेश के बाद पूरी ₹1 करोड़ की रकम सुरक्षित की गई और ठगी के 10 दिनों के भीतर पीड़ित को वापस कर दी गई।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि गिरफ्तार आरोपी ने कथित तौर पर यह अपराध अकेले किया था या वह किसी बड़े साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा था। पुलिस उन अन्य संदिग्धों की पहचान करने का भी प्रयास कर रही है, जिनकी भूमिका कथित तौर पर फर्जी WhatsApp प्रोफाइल तैयार करने, धोखाधड़ी वाले संदेश भेजने और ठगी की रकम को संभालने में हो सकती है।
जांच का एक प्रमुख हिस्सा उस कॉरपोरेट करंट अकाउंट की पड़ताल भी है, जिसके जरिए कथित तौर पर रकम भेजी गई। पुलिस खाते के स्वामित्व, लेनदेन के इतिहास और अन्य बैंक खातों से उसके संबंधों की जांच कर रही है। इसका उद्देश्य पूरी धनराशि की आवाजाही का पता लगाना और नेटवर्क में शामिल लोगों की भूमिका निर्धारित करना है।
साइबर क्राइम अधिकारियों ने नागरिकों और कारोबारियों को केवल WhatsApp नाम या डिस्प्ले तस्वीर के आधार पर बड़ी रकम ट्रांसफर नहीं करने की सलाह दी है। पुलिस के मुताबिक, ठग आसानी से किसी व्यक्ति की प्रोफाइल तस्वीर और नाम की नकल कर भरोसेमंद कारोबारी, अधिकारी, रिश्तेदार या कर्मचारी बनकर लोगों को निशाना बना सकते हैं।
पुलिस ने कहा कि WhatsApp या किसी अन्य मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर वित्तीय भुगतान का अनुरोध मिलने पर रकम भेजने से पहले दूसरे माध्यम से संबंधित व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करनी चाहिए। खासकर बड़े कारोबारी लेनदेन में कर्मचारियों को निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और केवल मैसेजिंग ऐप पर मिले निर्देश के आधार पर भुगतान नहीं करना चाहिए।
साइबर ठगी का शिकार होने वाले लोगों से पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करने की अपील की है। शिकायत में देरी होने पर रकम को आगे ट्रांसफर किया जा सकता है, जबकि तत्काल सूचना मिलने से बैंकिंग चैनल के जरिए धन को रोकने या बरामद करने की संभावना बढ़ जाती है। पीड़ितों को तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर कॉल करने या National Cyber Crime Reporting Portal के जरिए शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है।
पूरी ₹1 करोड़ की रकम 10 दिनों के भीतर वापस मिलने से इस मामले में त्वरित शिकायत, वित्तीय निगरानी और कानूनी समन्वय की भूमिका सामने आती है। पुलिस की जांच अभी जारी है और अधिकारी अन्य संभावित आरोपियों की पहचान करने के साथ ठगी की रकम की पूरी मनी ट्रेल का पता लगाने में जुटे हैं।
