नई दिल्ली: भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल बुनियादी ढांचे के साथ साइबर हमलों का खतरा भी लगातार गंभीर होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) को वर्ष 2022 से जून 2026 तक केंद्र और राज्य सरकारों से जुड़े 52.68 लाख से अधिक साइबर हमलों और घटनाओं की जानकारी मिली है। इन हमलों में वित्तीय नुकसान, संवेदनशील डेटा की चोरी, रैंसमवेयर, जासूसी, सिस्टम को बाधित करने और महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने जैसी गतिविधियां शामिल हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए सरकार ने वित्तीय, बिजली और महत्वपूर्ण सूचना ढांचे के लिए अलग-अलग साइबर सुरक्षा तंत्र विकसित किए हैं।
चार साल में साइबर घटनाओं में तेज उछाल
CERT-In के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में सरकारी संस्थानों से जुड़ी 1,92,439 साइबर घटनाएं दर्ज हुई थीं। 2023 में इनकी संख्या बढ़कर 2,04,844 हो गई। इसके बाद 2024 में साइबर घटनाओं में बड़ा उछाल आया और आंकड़ा 13,09,372 तक पहुंच गया। वर्ष 2025 में 18,21,767 घटनाएं दर्ज की गईं। वहीं, 2026 में जून तक ही 10,75,220 साइबर घटनाओं की जानकारी सामने आ चुकी थी।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि डिजिटल सिस्टम पर साइबर हमलों का स्वरूप और पैमाना तेजी से बदल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रिपोर्ट किए गए आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते, क्योंकि हर साइबर घटना की जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचना जरूरी नहीं है। कई मामलों में हमले का पता काफी देर से चलता है या उसे सामान्य तकनीकी खराबी समझ लिया जाता है।
AI और रैंसमवेयर ने बढ़ाई चुनौती
साइबर अपराधियों की रणनीति भी तेजी से बदल रही है। पारंपरिक हैकिंग के साथ अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), चोरी किए गए क्रेडेंशियल, सोशल इंजीनियरिंग और रैंसमवेयर जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हमलावर किसी सिस्टम में प्रवेश करने के बाद डेटा चोरी करने के साथ-साथ उसे लॉक कर फिरौती की मांग कर सकते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, साइबर हमले अब केवल तकनीकी कमजोरियों का फायदा उठाने तक सीमित नहीं हैं। अपराधी मानव व्यवहार, चोरी हुए लॉगिन विवरण, कमजोर सुरक्षा व्यवस्था और स्वचालित तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में संस्थानों के लिए लगातार निगरानी, नियमित सुरक्षा ऑडिट, कर्मचारियों की साइबर जागरूकता और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था जरूरी हो गई है।
चीन और पाकिस्तान से जुड़े राज्य-समर्थित खतरे
AI और साइबर विशेषज्ञ प्रवीण कौशल के अनुसार, सुरक्षा आकलनों में भारत के खिलाफ राज्य-समर्थित साइबर गतिविधियों में चीन और पाकिस्तान से जुड़े समूहों की भूमिका को गंभीर चुनौती माना गया है। ऐसे हमलों का उद्देश्य केवल सूचनाएं हासिल करना नहीं, बल्कि रणनीतिक और महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियों को बाधित करना भी हो सकता है।
महत्वपूर्ण सरकारी नेटवर्क, वित्तीय संस्थान, ऊर्जा क्षेत्र और अन्य संवेदनशील प्रणालियां ऐसे हमलों के संभावित निशाने पर रहती हैं। किसी बड़े डिजिटल नेटवर्क के बाधित होने की स्थिति में इसका असर केवल संबंधित संस्था तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि आम नागरिकों और अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
रैंसमवेयर से बैंकिंग व्यवस्था भी प्रभावित
साइबर हमलों का असर बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था पर भी देखा गया है। वर्ष 2024 में करीब 300 छोटे सहकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर बड़े रैंसमवेयर हमले की घटना सामने आई थी। इसके चलते प्रभावित बैंकों का डिजिटल और भुगतान संबंधी कामकाज करीब 48 से 72 घंटे तक बाधित रहा।
दिसंबर 2022 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के सर्वर पर हुआ साइबर हमला भी देश के बड़े सरकारी डिजिटल सिस्टम पर हमले का प्रमुख उदाहरण रहा। हमले के बाद ऑनलाइन पंजीकरण, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों के डेटा प्रबंधन से जुड़ी सेवाएं प्रभावित हुई थीं।
बिजली और परमाणु क्षेत्र भी निशाने पर
साइबर खतरा अब वित्तीय और सरकारी सेवाओं से आगे बढ़कर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे तक पहुंच चुका है। अक्टूबर 2020 में मुंबई में हुए बड़े बिजली संकट के पीछे चीन से जुड़े साइबर समूह की संभावित भूमिका को लेकर सुरक्षा आकलन सामने आए थे।
जुलाई 2026 में तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र से जुड़े एक ठेकेदार के सर्वर में सेंधमारी और करीब 19 हजार दस्तावेजों के संभावित लीक की आशंका ने भी महत्वपूर्ण सूचना प्रणालियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई। ऐसे मामलों में किसी सिस्टम पर साइबर हमला होने से सेवाएं बाधित होने के साथ संवेदनशील तकनीकी जानकारी के दुरुपयोग का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बनाए गए सुरक्षा तंत्र
सरकार ने साइबर हमलों से निपटने के लिए अलग-अलग महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विशेष प्रतिक्रिया तंत्र विकसित किए हैं। बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के लिए CSIRT-Fin बनाया गया है, जबकि बिजली क्षेत्र में सितंबर 2024 में CSIRT-Power की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन और पावर ग्रिड से जुड़े डिजिटल सिस्टम पर साइबर खतरों की पहचान और प्रतिक्रिया को मजबूत करना है।
National Critical Information Infrastructure Protection Centre (NCIIPC) देश के महत्वपूर्ण सूचना ढांचे की सुरक्षा से जुड़े कार्यों पर ध्यान देता है। इसके अलावा National Cyber Security Coordinator के माध्यम से विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच साइबर सुरक्षा से संबंधित समन्वय को मजबूत करने की व्यवस्था की गई है।
237 संस्थाएं कर रही साइबर सुरक्षा ऑडिट
केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया है कि साइबर सुरक्षा ऑडिट के लिए 237 सूचना सुरक्षा ऑडिटिंग संस्थाओं को पैनल में शामिल किया गया है। ये संस्थाएं सरकारी और अन्य डिजिटल प्रणालियों की वेबसाइट, नेटवर्क, कंप्यूटर सिस्टम तथा अन्य तकनीकी ढांचे में मौजूद कमजोरियों की जांच करती हैं।
CERT-In समय-समय पर साइबर सुरक्षा मॉक ड्रिल आयोजित करने के साथ नए खतरों को लेकर अलर्ट भी जारी करता है। इसका उद्देश्य संस्थानों को संभावित हमलों के लिए पहले से तैयार करना और हमले की स्थिति में प्रतिक्रिया समय कम करना है।
डिजिटल विस्तार के साथ सुरक्षा भी जरूरी
आधार, जनधन खातों, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सरकारी सेवाओं के विस्तार ने देश में डिजिटल पहुंच को व्यापक बनाया है। इसके साथ नागरिकों की डिजिटल पहचान, बैंकिंग जानकारी और ऑनलाइन लेनदेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ी है।
साइबर अपराधियों के संगठित नेटवर्क और ‘फ्रॉड-ऐज-अ-सर्विस’ जैसी गतिविधियों ने खतरे को और जटिल बनाया है। ऐसे में केवल तकनीकी सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। नियमित ऑडिट, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, डिजिटल जागरूकता, मजबूत पहचान प्रणाली और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को साथ लेकर चलना होगा।
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से विस्तार कर रही है, साइबर सुरक्षा की चुनौती भी उतनी ही बड़ी होती जा रही है। आने वाले समय में AI आधारित हमलों, रैंसमवेयर और राज्य-समर्थित साइबर गतिविधियों से निपटने के लिए सरकारी एजेंसियों, वित्तीय संस्थानों, तकनीकी कंपनियों और सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय महत्वपूर्ण होगा।
