मां और पति के इलाज के नाम पर ₹4.8 लाख के फर्जी मेडिकल क्लेम का आरोप, मंगलुरु पुलिस आयुक्त कार्यालय की कर्मचारी पर केस

Team The420
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मंगलुरु: मंगलुरु पुलिस आयुक्त कार्यालय से संबद्ध एक फर्स्ट डिवीजन असिस्टेंट के खिलाफ कथित तौर पर करीब ₹4.8 लाख के फर्जी और डुप्लीकेट मेडिकल प्रतिपूर्ति दावे जमा करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कर्मचारी ने अपनी मां और पति के इलाज से जुड़े मेडिकल बिलों के आधार पर प्रतिपूर्ति का दावा किया। दस्तावेजों की जांच के दौरान बिलों और हस्ताक्षरों में कथित विसंगतियां सामने आने के बाद मामला अधिकारियों के संज्ञान में आया।

मंगलुरु दक्षिण पुलिस ने कर्मचारी के खिलाफ मिली शिकायत के आधार पर केस दर्ज किया है। शिकायत के मुताबिक, आरोपी महिला ने अपनी मां और पति के इलाज से संबंधित मेडिकल दस्तावेज और बिल प्रतिपूर्ति के लिए जमा किए थे। दस्तावेजों की जांच के दौरान कुछ बिलों में असंगतियां और हस्ताक्षरों में अंतर पाया गया। इसके बाद संबंधित दावों की दोबारा जांच शुरू की गई।

आरोपी महिला पुलिस आयुक्त कार्यालय में फर्स्ट डिवीजन असिस्टेंट के पद पर कार्यरत है। कथित अनियमितता उस समय सामने आई, जब मेडिकल प्रतिपूर्ति से जुड़े दस्तावेजों की नियमित जांच की जा रही थी। लेखा अधीक्षक को बिलों और हस्ताक्षरों में गड़बड़ी नजर आई। उन्होंने मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी, जिसके बाद दस्तावेजों की विस्तृत जांच कराई गई।

आंतरिक जांच के बाद मामले को आगे की कार्रवाई के लिए भेजा गया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत के आधार पर मंगलुरु दक्षिण पुलिस ने कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज किया। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जमा किए गए थे और उन्हें किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया गया।

डुप्लीकेट मेडिकल बिलों की जांच

सरकारी कर्मचारियों द्वारा मेडिकल प्रतिपूर्ति के लिए आमतौर पर अस्पताल के बिल, डॉक्टर की पर्ची, उपचार से संबंधित दस्तावेज और अन्य जरूरी कागजात जमा किए जाते हैं। मौजूदा मामले में पुलिस यह जांच कर रही है कि क्या कथित तौर पर एक ही दस्तावेज या बिल का इस्तेमाल एक से अधिक बार प्रतिपूर्ति हासिल करने के लिए किया गया था या दस्तावेजों में किसी अन्य तरह से हेरफेर किया गया।

मामले में कथित तौर पर करीब ₹4.8 लाख की रकम शामिल है। यह राशि आरोपी की मां और पति के इलाज से संबंधित बताई गई है। जांच के दौरान संबंधित अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों से मूल रिकॉर्ड हासिल कर यह सत्यापित किया जा सकता है कि संबंधित उपचार वास्तव में हुआ था या नहीं, इलाज पर कितनी रकम खर्च हुई और प्रतिपूर्ति के लिए जमा किए गए बिल वास्तविक थे या नहीं।

बिलों पर मौजूद हस्ताक्षरों को लेकर सामने आई कथित विसंगतियां भी जांच का अहम हिस्सा होंगी। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर सकती है कि दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षर वास्तविक थे या नहीं और मेडिकल प्रतिपूर्ति से संबंधित कागजात किसने तैयार या जमा किए थे।

जांच में यह भी देखा जाएगा कि प्रतिपूर्ति दावों की प्रशासनिक स्तर पर किस तरह जांच की गई। अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ, क्या समान बिल दोबारा प्रस्तुत किए गए और विवादित दावों के आधार पर कोई भुगतान वास्तव में जारी किया गया था।

सरकारी रकम के नुकसान का पता लगाएगी जांच

फिलहाल आरोपों की जांच जारी है और केस दर्ज होना आरोपी की दोषसिद्धि नहीं माना जाता। पुलिस को यह स्थापित करना होगा कि कथित डुप्लीकेट या फर्जी दस्तावेज जानबूझकर प्रतिपूर्ति हासिल करने के लिए जमा किए गए थे या नहीं। साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि इन कथित अनियमितताओं से सरकारी खजाने को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ या नहीं।

पुलिस आधिकारिक प्रतिपूर्ति रिकॉर्ड और बैंकिंग विवरणों की भी जांच कर सकती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विवादित दावों के आधार पर कोई रकम जारी हुई थी या नहीं। यदि भुगतान हुआ है तो जांच के दौरान उसकी सटीक राशि और भुगतान की तारीखों का पता लगाया जाएगा।

दस्तावेज तैयार करने, सत्यापित करने या प्रतिपूर्ति प्रक्रिया में शामिल अन्य लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। अधिकारियों से यह भी जानकारी ली जा सकती है कि कथित विसंगतियां शुरुआती सत्यापन के दौरान कैसे सामने नहीं आईं।

यह मामला सरकारी मेडिकल प्रतिपूर्ति व्यवस्था में दस्तावेजों के प्रभावी सत्यापन की जरूरत को भी रेखांकित करता है। अस्पतालों से सीधे रिकॉर्ड की पुष्टि, मूल बिलों की जांच और पहले जमा किए गए दस्तावेजों से मिलान जैसे उपाय फर्जी या डुप्लीकेट दावों की पहचान में मदद कर सकते हैं।

पुलिस ने मामले में आगे की जांच जारी रहने की बात कही है। अब मेडिकल दस्तावेजों, प्रतिपूर्ति रिकॉर्ड और संबंधित वित्तीय विवरणों की जांच के आधार पर घटनाक्रम स्पष्ट करने और करीब ₹4.8 लाख के कथित दावे में जिम्मेदारी तय करने की कोशिश की जा रही है। आरोप जांच में साबित होने पर कर्मचारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ विभागीय स्तर पर भी कार्रवाई हो सकती है।

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