नई दिल्ली: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा “एनर्जी ड्रिंक” श्रेणी को मान्यता न देने के फैसले के बाद PepsiCo India ने अपने लोकप्रिय पेय Sting की नई कैन और बोतलों से “Energy” शब्द हटाना शुरू कर दिया है। कंपनी ने कहा है कि वह सभी लागू नियामकीय प्रावधानों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित कर रही है। दूसरी ओर, इस श्रेणी की अन्य प्रमुख कंपनियों ने सरकार से 90 दिन की निर्धारित समय-सीमा बढ़ाने की मांग की है ताकि पहले से तैयार पैकेजिंग सामग्री और बाजार में मौजूद स्टॉक के कारण होने वाले संभावित नुकसान से बचा जा सके।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, जुलाई से लागू नई नियामकीय व्यवस्था के अनुरूप PepsiCo ने Sting की नई पैकेजिंग का उत्पादन शुरू कर दिया है, जिसमें “Energy” शब्द का उपयोग नहीं किया जा रहा है। कंपनी के मौजूदा स्टॉक के समाप्त होने के बाद नई कैन और बोतलें बाजार में उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके साथ ही Sting से जुड़े सभी विज्ञापनों और प्रचार अभियानों में भी आवश्यक बदलाव किए जा रहे हैं ताकि वे नए नियमों के अनुरूप हों।
PepsiCo के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी सभी लागू नियमों का पूरी तरह पालन कर रही है। हालांकि कंपनी ने इस विषय पर विस्तृत टिप्पणी नहीं की, लेकिन उद्योग सूत्रों का कहना है कि Sting के लिए तैयार किए गए विज्ञापनों, डिजिटल अभियानों और अन्य प्रचार सामग्री में भी संशोधन किया जा रहा है। इनमें Formula One के साथ जुड़े ब्रांड प्रचार अभियान भी शामिल हैं।
PepsiCo ने पिछले वर्ष Formula One के साथ पांच वर्ष की वैश्विक प्रायोजन (Global Sponsorship) साझेदारी की थी, जिसके तहत Sting को खेल की आधिकारिक ऊर्जा पेय (Official Energy Drink) के रूप में प्रचारित किया गया था। इस साझेदारी के अंतर्गत रेस ट्रैक पर ब्रांडिंग, फैन जोन गतिविधियां और विभिन्न विपणन अभियान संचालित किए जा रहे थे। अब नियामकीय बदलावों के कारण इन प्रचार अभियानों को भी नए दिशा-निर्देशों के अनुरूप संशोधित किया जा रहा है।
भारत में ऊर्जा पेय (Energy Drinks) का बाजार लगभग ₹13,000 करोड़ का माना जाता है, जबकि इस श्रेणी की कंपनियां हर वर्ष संयुक्त रूप से लगभग ₹2,000 करोड़ विज्ञापन और विपणन पर खर्च करती हैं। लंबे समय तक Red Bull इस बाजार में अग्रणी रहा, लेकिन वर्ष 2017 में लॉन्च हुए Sting ने कम कीमत वाली PET बोतलों के माध्यम से बड़े उपभोक्ता वर्ग तक पहुंच बनाकर बाजार हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि की।
FSSAI ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि वह “Energy Drinks” को एक अलग खाद्य श्रेणी के रूप में मान्यता नहीं देता। नियामक का मानना है कि “Revitalises Body and Mind” जैसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं। इसी कारण कंपनियों को ऐसे दावों और लेबलिंग में बदलाव करने के निर्देश दिए गए हैं। इस फैसले का असर केवल पैकेजिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि विज्ञापन, ब्रांडिंग और विपणन रणनीतियों पर भी पड़ रहा है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, Indian Beverage Association (IBA) ने FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को पत्र लिखकर नियमों को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श करने और अनुपालन की समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया है। कंपनियों का कहना है कि पहले से छपी हुई कैन, PET बोतलों और पैकेजिंग सामग्री में भारी निवेश किया जा चुका है। यदि उन्हें तत्काल बदलना पड़ा तो उद्योग को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसी बीच, देश के विभिन्न हिस्सों में वितरकों ने पुराने लेबल वाले ऊर्जा पेयों का स्टॉक उठाने में भी अनिच्छा दिखाई है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि कई खुदरा दुकानों पर कुछ ब्रांडों की उपलब्धता प्रभावित होने लगी है क्योंकि कंपनियां नई पैकेजिंग तैयार होने तक पुराने स्टॉक की निकासी को लेकर सावधानी बरत रही हैं। इससे आपूर्ति श्रृंखला पर भी अस्थायी प्रभाव देखने को मिल सकता है।
खाद्य नियामक विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को किसी भी उत्पाद के बारे में स्पष्ट, वैज्ञानिक और भ्रामक दावों से मुक्त जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि लेबलिंग और विज्ञापन वास्तविक उत्पाद विशेषताओं के अनुरूप हों तो उपभोक्ता अधिक सूचित निर्णय ले सकते हैं। वहीं उद्योग जगत का मानना है कि नियामकीय बदलावों को लागू करते समय कंपनियों को पर्याप्त संक्रमण अवधि (Transition Period) दी जानी चाहिए, ताकि वे बिना अनावश्यक आर्थिक नुकसान के नए मानकों का पालन कर सकें। फिलहाल सभी की निगाहें FSSAI और सरकार के अगले निर्णय पर टिकी हैं कि उद्योग की समय-सीमा बढ़ाने की मांग पर क्या फैसला लिया जाता है।
