नई दिल्ली: कंपनी विधेयक की समीक्षा कर रही संसद की एक समिति ने राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) की प्रस्तावित शक्तियों के विस्तार पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से इन्हें सीमित रखने और ऑडिट संबंधी प्रस्तावित सुधारों में जोखिम-आधारित (रिस्क-बेस्ड) दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की है। लोकसभा में प्रस्तुत समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि नियामकीय ढांचे को मजबूत बनाने के साथ-साथ भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान (ICAI) की वैधानिक स्वायत्तता और संतुलित नियामकीय व्यवस्था को भी बनाए रखना आवश्यक है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में गैर-ऑडिट सेवाओं पर प्रस्तावित पूर्ण प्रतिबंध तथा ऑडिटर के लिए तीन वर्ष की अनिवार्य कूलिंग-ऑफ अवधि को अत्यधिक कठोर बताया। इसके अलावा कंपनियों को एक वर्ष में दो बार शेयर बायबैक की अनुमति देने के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि एक वर्ष की गणना किस आधार पर होगी और दो बायबैक के बीच अनिवार्य छह माह का अंतराल कैसे निर्धारित किया जाएगा।
समिति ने NFRA को प्रशासनिक नियुक्तियों से संबंधित व्यापक अधिकार देने के प्रस्ताव पर भी आपत्ति जताई। रिपोर्ट में कहा गया कि प्राधिकरण के सचिव और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहना चाहिए, ताकि जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित की जा सके। समिति का मानना है कि किसी नियामक संस्था को बिना पर्याप्त निगरानी के नियुक्ति संबंधी पूर्ण अधिकार देना संस्थागत संतुलन के लिए उचित नहीं होगा।
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई कि NFRA के आदेशों का पालन नहीं करने पर कारावास का प्रस्तावित प्रावधान हटाया जाए। समिति का कहना है कि सरकार पहले से ही विभिन्न आर्थिक कानूनों के अपराधों के गैर-अपराधीकरण (डीक्रिमिनलाइजेशन) की नीति पर काम कर रही है, इसलिए इस प्रकार का दंडात्मक प्रावधान उस व्यापक नीति के अनुरूप नहीं है।
समिति ने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) को यह भी सुनिश्चित करने की सलाह दी कि कंपनी अधिनियम में किए जाने वाले संशोधनों से ICAI की वैधानिक स्वायत्तता प्रभावित न हो। रिपोर्ट के अनुसार, यदि NFRA को पंजीकरण, जांच, नियम निर्माण और कॉर्पोरेट निकाय का व्यापक दर्जा देने जैसी शक्तियां प्रदान की जाती हैं, तो इससे ICAI के अधिकार क्षेत्र के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इससे नियामकीय दोहराव, संस्थागत विभाजन, अनुपालन लागत में वृद्धि और अधिकार क्षेत्र को लेकर अनिश्चितता पैदा होने की आशंका है।
हालांकि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने समिति के समक्ष यह पक्ष रखा कि प्रस्तावित प्रावधान भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI), भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) तथा दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) जैसे अन्य नियामकों की शक्तियों के अनुरूप हैं और इनका उद्देश्य NFRA को एक स्वतंत्र एवं प्रभावी ऑडिट नियामक बनाना है। इसके बावजूद समिति ने सुझाव दिया कि जांच, दंड की वसूली और अन्य महत्वपूर्ण विषयों से जुड़े प्रावधान केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के माध्यम से लागू किए जाएं, ताकि उन पर संसदीय निगरानी बनी रहे और अत्यधिक शक्तियों के केंद्रीकरण से बचा जा सके।
ऑडिट सुधारों के संदर्भ में समिति ने तीन वर्ष की कूलिंग-ऑफ अवधि को विशेष रूप से समूह कंपनियों, संयुक्त ऑडिट, कार्यकाल के बीच इस्तीफा देने और पुनर्नियुक्ति न होने जैसी परिस्थितियों में अव्यावहारिक बताया। इसी प्रकार वैधानिक ऑडिटरों द्वारा सभी प्रकार की गैर-ऑडिट सेवाएं देने पर पूर्ण प्रतिबंध को भी अत्यधिक व्यापक माना गया। समिति का कहना है कि इससे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) और छोटे ऑडिट फर्मों पर अनावश्यक अनुपालन बोझ पड़ेगा।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि गैर-ऑडिट सेवाओं पर प्रतिबंध केवल उच्च जोखिम वाली या सार्वजनिक हित से जुड़ी संस्थाओं तक सीमित रखा जाए। साथ ही, संबंधित प्रावधान में “जैसा कि निर्धारित किया जाए” शब्द जोड़कर यह स्पष्ट किया जाए कि किन सेवाओं पर प्रतिबंध लागू होगा, जिससे अलग-अलग व्याख्याओं की संभावना समाप्त हो सके। समिति ने यह भी कहा कि ऑडिट फर्म के प्रत्येक भागीदार का भारतीय वैधानिक संस्था में पंजीकृत होना अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव बहु-विषयक विशेषज्ञता को सीमित करेगा। इससे आईटी विशेषज्ञों, फोरेंसिक विश्लेषकों, एमबीए पेशेवरों और विदेशी योग्यता रखने वाले विशेषज्ञों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, समिति ने वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के सीमित दायित्व भागीदारी (LLP) में रूपांतरण संबंधी प्रावधानों में भी संशोधन और नियामकीय स्पष्टता लाने की सिफारिश की है।
