फरीदाबाद: हरियाणा के फरीदाबाद की एक अदालत ने करीब ₹3.45 करोड़ की कथित निवेश धोखाधड़ी के मामले में एसआरएस समूह के चेयरमैन अनिल जिंदल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और उपलब्ध रिकॉर्ड से यह भी प्रतीत होता है कि आरोपी ने जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया। अदालत ने माना कि इस चरण पर अग्रिम जमानत दिए जाने से निष्पक्ष और प्रभावी जांच प्रभावित हो सकती है।
मामला सेक्टर-31 थाना क्षेत्र में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता मोहित गोयल के अनुसार, वर्ष 2014 में अनिल जिंदल ने अधिक मुनाफे का भरोसा देकर उन्हें निवेश के लिए प्रेरित किया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विभिन्न चरणों में उनसे कुल ₹5.05 करोड़ का निवेश कराया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि शुरुआती अवधि में उन्हें निवेश पर कुछ लाभ मिला और लगभग ₹1.60 करोड़ की राशि वापस भी की गई, लेकिन शेष ₹3.45 करोड़ न तो लौटाए गए और न ही किए गए वादे पूरे किए गए। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कई बार मांग करने के बावजूद बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया।
प्राथमिकी के अनुसार, बाद में शिकायतकर्ता को बकाया राशि के समायोजन के लिए 16 फ्लैट और एक फार्म हाउस देने का प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि उनका आरोप है कि यह आश्वासन भी पूरा नहीं किया गया और न ही प्रस्तावित संपत्तियों का स्वामित्व या कब्जा उन्हें सौंपा गया। इन्हीं आरोपों के आधार पर धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया।
अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका है। बचाव पक्ष का दावा था कि समझौते के तहत शिकायतकर्ता के परिजनों के नाम चार फ्लैट हस्तांतरित किए जा चुके हैं, इसलिए आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
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वहीं अभियोजन पक्ष ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने जांच एजेंसी के समक्ष संतोषजनक जवाब नहीं दिए और कई आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए। अभियोजन का कहना था कि वित्तीय लेनदेन और दस्तावेजों की जांच अभी जारी है तथा इस स्तर पर अग्रिम जमानत दिए जाने से जांच प्रभावित हो सकती है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी के बयानों और उपलब्ध रिकॉर्ड में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है। अदालत ने उल्लेख किया कि एक ओर आरोपी ने शिकायतकर्ता और संबंधित कंपनी से किसी भी प्रकार के संबंध से इनकार किया, जबकि दूसरी ओर पहले दायर एक हलफनामे में शिकायतकर्ता की निवेश राशि के समायोजन के लिए फ्लैट दिए जाने का उल्लेख किया गया था। अदालत ने माना कि ऐसे विरोधाभास मामले की विस्तृत जांच की आवश्यकता को और अधिक मजबूत करते हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पक्षों के बीच हुआ निजी समझौता अपने आप में अग्रिम जमानत का आधार नहीं बन सकता। आदेश में कहा गया कि आरोपों की गंभीरता और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को देखते हुए आरोपी को इस स्तर पर राहत देना उचित नहीं होगा।
एसआरएस समूह और उसके चेयरमैन के खिलाफ पहले भी निवेश से जुड़ी कथित धोखाधड़ी के कई मामले दर्ज हो चुके हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, अनिल जिंदल और उनके सहयोगियों के खिलाफ विभिन्न थानों में 50 से अधिक प्राथमिकी दर्ज हैं। वर्ष 2018 में उनकी गिरफ्तारी हुई थी और लगभग छह वर्ष न्यायिक हिरासत में रहने के बाद उन्हें दिसंबर 2024 में जमानत मिली थी। हालांकि वर्तमान मामला अलग प्राथमिकी से संबंधित है और इसकी जांच जारी है। अदालत के ताजा आदेश के बाद जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेनदेन, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की पड़ताल आगे बढ़ाएंगी, जिसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।
