SIM फ्रॉड, स्पूफ्ड कॉल, फिशिंग लिंक और फर्जी मोबाइल कनेक्शनों पर रोक के लिए उच्चस्तरीय बैठक; दूरसंचार कंपनियों, I4C और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने पर जोर

डिजिटल ठगों पर कसा शिकंजा, पुणे पुलिस ने पीड़ितों को दिलाए ₹80 लाख से अधिक

Roopa
By Roopa
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पुणे: ऑनलाइन ठगी के बढ़ते मामलों के बीच पुणे पुलिस ने साइबर अपराध के खिलाफ व्यापक अभियान चलाते हुए बड़ी सफलता हासिल की है। डिजिटल जांच प्रणाली, बैंकिंग समन्वय और तकनीकी संसाधनों के प्रभावी उपयोग से पुलिस ने साइबर ठगी के शिकार लोगों को ₹80 लाख से अधिक की रकम वापस दिलाई है। इसके साथ ही साइबर अपराधियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई करते हुए संदिग्ध बैंक खातों, आपत्तिजनक ऑनलाइन लिंक और अपराध में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल फोन पर भी शिकंजा कसा गया है।

पुणे पुलिस आयुक्तालय ने महाराष्ट्र साइबर और केंद्रीय एजेंसियों के सहयोग से साइबर अपराध की जांच और शिकायत निस्तारण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया है। अधिकारियों के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली के बेहतर उपयोग से मामलों में त्वरित कार्रवाई संभव हुई है, जिससे पीड़ितों की धनराशि समय रहते सुरक्षित कर वापस दिलाने में सफलता मिली है।

अभियान के तहत पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को साइबर अपराध की तकनीकी जांच का विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। प्रशिक्षण में डिजिटल साक्ष्य एकत्र करने, बैंकिंग ट्रांजैक्शन की जांच, मोबाइल और इंटरनेट आधारित अपराधों की पड़ताल तथा साइबर फोरेंसिक तकनीकों के उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इससे जांच अधिकारियों की क्षमता बढ़ने के साथ साइबर अपराधियों तक तेजी से पहुंच बन रही है।

पुलिस का कहना है कि कार्रवाई केवल पुणे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में आरोपी दूसरे राज्यों से साइबर ठगी को अंजाम देते पाए गए हैं। ऐसे मामलों में संबंधित राज्यों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर कार्रवाई की जा रही है, जिससे अंतरराज्यीय साइबर अपराध नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो रहा है।

अधिकारियों के अनुसार, ₹5 लाख से अधिक की साइबर ठगी के मामलों में तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने की व्यवस्था से जांच को गति मिली है। इससे बैंकों को तुरंत अलर्ट भेजकर संदिग्ध खातों को फ्रीज करने और ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने में मदद मिल रही है। जांच के दौरान जिन बैंक खातों को गलती से फ्रीज किया गया था, उनका सत्यापन कर उन्हें अनफ्रीज भी किया गया, ताकि निर्दोष खाताधारकों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े।

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पुलिस ने सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सक्रिय साइबर अपराधियों के खिलाफ भी अभियान तेज किया है। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में धोखाधड़ी से जुड़े आपत्तिजनक लिंक हटवाए गए हैं। इसके अलावा संदिग्ध बैंक खातों की पहचान, म्यूल अकाउंट पर निगरानी तथा साइबर अपराध में इस्तेमाल होने वाले चोरी या गुम हुए मोबाइल फोन की ट्रैकिंग और ब्लॉकिंग की कार्रवाई लगातार जारी है।

प्रवर्तन कार्रवाई के साथ-साथ जनजागरूकता को भी प्राथमिकता दी जा रही है। पुलिस ने स्कूलों, कॉलेजों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और विभिन्न सामाजिक संगठनों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को डिजिटल सुरक्षा के प्रति सचेत किया है। इन कार्यक्रमों में डिजिटल अरेस्ट, निवेश घोटाला, फर्जी केवाईसी, ओटीपी धोखाधड़ी, बैंक अधिकारी बनकर किए जाने वाले कॉल, सोशल मीडिया फ्रॉड और फर्जी लिंक जैसे साइबर अपराधों से बचने के तरीके बताए जा रहे हैं।

प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि साइबर अपराध से मुकाबले में तकनीक, त्वरित कार्रवाई और जनजागरूकता—तीनों की समान भूमिका है। उनके अनुसार, साइबर ठगी का शिकार होने पर शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि पीड़ित तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या आधिकारिक साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराता है, तो ठगी गई रकम को फ्रीज कर वापस दिलाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। उन्होंने लोगों से किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर धनराशि ट्रांसफर न करने और बैंकिंग या व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से बचने की अपील की।

पुलिस ने नागरिकों को आगाह किया है कि किसी भी लालच, कमीशन या आसान कमाई के बदले अपने बैंक खाते, एटीएम कार्ड या पहचान संबंधी दस्तावेज किसी अन्य व्यक्ति को उपयोग के लिए न दें। ऐसे खाते साइबर अपराधियों द्वारा म्यूल अकाउंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं और खाताधारक भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।

पुलिस का कहना है कि साइबर अपराध के खिलाफ यह अभियान आगे भी जारी रहेगा। आने वाले समय में तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी, अंतरराज्यीय समन्वय और जनजागरूकता कार्यक्रमों का दायरा और बढ़ाया जाएगा, ताकि ऑनलाइन ठगी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके और नागरिकों की डिजिटल सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाया जा सके।

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