रायपुर: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने रायपुर स्मार्ट सिटी परियोजना के नाम पर कथित तौर पर ₹15 करोड़ की धोखाधड़ी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में छत्तीसगढ़ के कारोबारी कृष्ण कुमार श्रीवास्तव को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि आरोपी ने अपनी कथित राजनीतिक पहुंच का प्रभाव दिखाकर एक निजी कंपनी और उसके प्रमोटरों को ऐसे सब-कॉन्ट्रैक्ट का झांसा दिया, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं था। ईडी का कहना है कि इस कथित फर्जीवाड़े में फर्जी दस्तावेज, शेल कंपनियां और विदेशी वित्तीय लेनदेन का इस्तेमाल कर धन के प्रवाह को छिपाने का प्रयास किया गया।
ईडी के अनुसार, कृष्ण कुमार श्रीवास्तव को पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया। एजेंसी ने बताया कि वह लंबे समय से फरार चल रहा था और उसके खिलाफ अदालत द्वारा पहले ही उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) आदेश जारी किया जा चुका था। इसी आधार पर उसकी तलाश की जा रही थी। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को रायपुर स्थित विशेष पीएमएलए अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत ने उसे 7 अगस्त तक नौ दिन की ईडी हिरासत में भेज दिया।
जांच एजेंसी ने अदालत में दायर अपने रिमांड आवेदन में दावा किया कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया। ईडी का यह भी आरोप है कि श्रीवास्तव राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री का करीबी सहयोगी था और उसने स्वयं को एक वरिष्ठ राजनीतिक पदाधिकारी का विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) अथवा निजी सहायक (पीए) बताकर शिकायतकर्ताओं का विश्वास हासिल किया। एजेंसी के अनुसार, आरोपी ने इसी कथित राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर स्मार्ट सिटी परियोजना में सब-कॉन्ट्रैक्ट दिलाने का भरोसा दिया।
मनी लॉन्ड्रिंग का यह मामला पुलिस द्वारा दर्ज उस प्राथमिकी पर आधारित है, जिसमें रावत एसोसिएट्स और उसके प्रमोटरों ने आरोप लगाया था कि रायपुर स्मार्ट सिटी परियोजना के नाम पर उनसे ₹15 करोड़ की धोखाधड़ी की गई। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने स्मार्ट सिटी परियोजना में सब-कॉन्ट्रैक्ट दिलाने का दावा किया, लेकिन जांच में ऐसा कोई वैध सब-कॉन्ट्रैक्ट मौजूद नहीं पाया गया।
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ईडी का आरोप है कि इस कथित धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और कंपनी के प्रमोटरों से प्राप्त धनराशि पांच ऐसी कंपनियों के बैंक खातों में जमा कराई गई, जिनका दिए गए पतों पर कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं मिला। जांच एजेंसी के अनुसार, इन बैंक खातों का विवरण एक सोशल मैसेजिंग एप के माध्यम से पीड़ितों को भेजा गया था। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि जिस मोबाइल नंबर से ये बैंक विवरण साझा किए गए, वह कथित तौर पर एक कार्यालय के चपरासी के नाम पर पंजीकृत था।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने लगभग ₹3.40 करोड़ की राशि पीड़ित पक्ष को वापस की और इसे भुगतान वापसी के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि ईडी का दावा है कि शेष धनराशि को कई शेल कंपनियों के माध्यम से परत-दर-परत (लेयरिंग) स्थानांतरित किया गया और बाद में माल ढुलाई (फ्रेट चार्ज) तथा कंटेनर लीजिंग जैसे व्यावसायिक खर्चों की आड़ में दुबई, हांगकांग, चीन और सिंगापुर भेज दिया गया। एजेंसी का मानना है कि यह पूरा लेनदेन कथित रूप से मनी लॉन्ड्रिंग के उद्देश्य से किया गया।
ईडी ने अदालत को यह भी बताया कि आरोपी ने कथित राजनीतिक संबंधों का हवाला देकर शिकायतकर्ता को निवेश के लिए प्रेरित किया। जांच के दौरान एक अन्य कारोबारी के साथ भी इसी तरह की कथित धोखाधड़ी सामने आई है। एजेंसी के अनुसार, उससे भी कुछ करोड़ रुपये नकद और बिना तारीख वाले हस्ताक्षरित बैंक चेक लिए गए थे। इस पहलू की भी विस्तृत जांच की जा रही है।
जांच एजेंसी अब कथित शेल कंपनियों, बैंक खातों, डिजिटल साक्ष्यों और विदेशी वित्तीय लेनदेन की विस्तृत पड़ताल कर रही है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस कथित धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क में अन्य किन व्यक्तियों या संस्थाओं की भूमिका रही। ईडी का कहना है कि जांच के दौरान यदि अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मामले की जांच जारी है।
