हैदराबाद: तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में निवेश संबंधी फर्जी मोबाइल ऐप्स के जरिए हुई साइबर ठगी के मामलों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन अलग-अलग मामलों में निवेशकों से ₹48 लाख से अधिक की कथित ठगी सामने आने के बाद हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने गूगल इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा है। पुलिस ने कंपनी के तकनीकी अधिकारियों को बैठक में शामिल होकर यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि गूगल प्ले स्टोर पर किसी ऐप को उपलब्ध कराने से पहले किस प्रकार की जांच और सुरक्षा प्रक्रिया अपनाई जाती है तथा धोखाधड़ी की शिकायत मिलने पर कंपनी कितनी तेजी से कार्रवाई करती है।
यह मामला उन तीन एफआईआर से जुड़ा है जो 30 जून से 15 जुलाई 2026 के बीच दर्ज की गई थीं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने शेयर बाजार में निवेश का दावा करने वाले मोबाइल ऐप्स के माध्यम से निवेश किया और बाद में उन्हें पता चला कि वे साइबर ठगी का शिकार हो गए हैं। पीड़ितों का कहना है कि ये ऐप्स गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध थे, जिसके कारण उन्हें उनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं हुआ।
प्राथमिकी दर्ज होने के बाद साइबर क्राइम पुलिस ने कथित जालसाजों के साथ-साथ गूगल इंडिया प्रमुख को भी सह-आरोपी के रूप में नामजद किया। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच के तहत कंपनी को औपचारिक नोटिस जारी किए गए, ताकि वह जांच में सहयोग कर सके और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराए।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार समाचार सामने आने के बाद गूगल इंडिया के नोडल अधिकारी ने साइबर क्राइम पुलिस से संपर्क किया। कंपनी ने दावा किया कि प्ले स्टोर पर ऐप प्रकाशित करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं और सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है। इसके बावजूद पुलिस अब विस्तृत जानकारी चाहती है कि किसी ऐप को मंजूरी देने, उसकी निगरानी करने तथा शिकायत मिलने पर उसे हटाने की वास्तविक प्रक्रिया क्या है।
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सूत्रों के मुताबिक इस सप्ताह होने वाली बैठक में गूगल के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों से यह भी पूछा जाएगा कि फर्जी निवेश ऐप्स किस प्रकार प्ले स्टोर तक पहुंच गए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कंपनी कौन-से अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू कर रही है। जांच एजेंसियां यह भी जानना चाहती हैं कि संदिग्ध ऐप्स की पहचान और उन्हें हटाने के लिए कंपनी की आंतरिक व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
पुलिस ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत गूगल जैसी इंटरमीडियरी कंपनियों को तीसरे पक्ष की गतिविधियों के लिए कुछ परिस्थितियों में कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है। हालांकि यदि किसी फर्जी ऐप के बारे में जानकारी मिलने के बाद भी उसे बिना उचित कारण समय पर नहीं हटाया जाता और उससे लोगों को आर्थिक नुकसान होता है, तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3) के तहत कंपनी की जवाबदेही भी जांच के दायरे में आ सकती है।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि साइबर क्राइम पुलिस द्वारा हटाने का अनुरोध भेजे जाने के बाद गूगल ने प्ले स्टोर पर उपलब्ध एक सक्रिय ऐप को ब्लॉक कर दिया। शिकायतों में जिन अन्य दो माध्यमों का उल्लेख किया गया था, उनमें से एक ऐप पहले ही प्ले स्टोर से निलंबित होने के कारण निष्क्रिय हो चुका था, जबकि तीसरा वास्तव में ऐप नहीं बल्कि ऐप के रूप में प्रस्तुत किया गया एक वेबपेज लिंक था।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि साइबर अपराधी अब निवेश के नाम पर दिखने वाले आकर्षक ऐप्स, नकली वेबसाइटों और सोशल इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बना रहे हैं। उनके अनुसार किसी भी निवेश ऐप को डाउनलोड करने से पहले उसके डेवलपर, समीक्षाओं, डाउनलोड इतिहास और नियामकीय मान्यता की जांच करनी चाहिए। निवेश से पहले संबंधित संस्था की आधिकारिक वेबसाइट से जानकारी का मिलान करना, केवल सत्यापित प्लेटफॉर्म का उपयोग करना और संदिग्ध लिंक या ऐप के माध्यम से वित्तीय लेनदेन से बचना अत्यंत आवश्यक है।
फिलहाल हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस डिजिटल साक्ष्यों, शिकायतों और संबंधित ऐप्स की तकनीकी जांच जारी रखे हुए है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी तथा यदि किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की भूमिका सामने आती है तो उसे भी जांच के दायरे में लाया जाएगा।
