आजमगढ़: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में फर्जी डोमिसाइल, पुलिस सत्यापन रिपोर्ट और अन्य सरकारी दस्तावेज तैयार कर सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी है। रानी की सराय थाना पुलिस ने इस मामले में गिरोह के तीन और सदस्यों को गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही इस प्रकरण में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। हालांकि गिरोह का कथित सरगना अभी भी फरार है और उसकी गिरफ्तारी के लिए ₹50 हजार का इनाम घोषित किया गया है।
पुलिस के अनुसार, यह गिरोह सरकारी विभागों में नौकरी दिलाने का झांसा देकर बेरोजगार युवाओं को निशाना बनाता था। विश्वास पैदा करने के लिए आरोपियों द्वारा फर्जी डोमिसाइल प्रमाणपत्र, पुलिस सत्यापन रिपोर्ट, सरकारी मोहरें और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर अभ्यर्थियों से मोटी रकम वसूली जाती थी। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरोह अब तक 100 से अधिक लोगों को अपना शिकार बना चुका है और करोड़ों रुपये की ठगी करने का आरोप है।
अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) के अनुसार, पुलिस ने मोबाइल लोकेशन और तकनीकी निगरानी के आधार पर रविवार देर रात आजमगढ़-वाराणसी मुख्य मार्ग पर स्थित कोटिला कट के पास छापेमारी कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बिहार के मधुबनी निवासी लालू उर्फ राकेश कुमार तथा उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा निवासी दिनेश कुमार गुप्ता और धर्मेंद्र गुप्ता के रूप में हुई है।
तलाशी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से बड़ी मात्रा में फर्जी और संदिग्ध दस्तावेज बरामद किए। इनमें चार मोबाइल फोन, 11 विभिन्न विभागों की मोहरें, इंकपैड, दो पुलिस सत्यापन प्रपत्र, प्रमाणित पुलिस सत्यापन रिपोर्ट, आधार कार्ड और पैन कार्ड की प्रतियां, जन्म प्रमाणपत्र की प्रति, नागालैंड सरकार से संबंधित पांच प्रपत्र, रेलवे पहचान पत्र, एक ब्रेजा कार और ₹5,360 नकद शामिल हैं। बरामद सामग्री से संकेत मिलता है कि गिरोह लंबे समय से सुनियोजित तरीके से फर्जी दस्तावेज तैयार कर लोगों को धोखा दे रहा था।
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जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी बेरोजगार युवाओं को सरकारी नौकरी दिलाने का भरोसा दिलाते थे और चयन प्रक्रिया को वास्तविक दिखाने के लिए नकली दस्तावेज, सत्यापन रिपोर्ट और सरकारी रिकॉर्ड जैसी सामग्री उपलब्ध कराते थे। कई मामलों में अभ्यर्थियों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जिसके बाद उनसे अलग-अलग चरणों के नाम पर धन वसूला जाता था।
पुलिस का कहना है कि गिरोह के पूरे नेटवर्क की जांच की जा रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने में किन-किन लोगों की भूमिका थी, दस्तावेज कहां तैयार किए जाते थे और ठगी से प्राप्त रकम किन खातों या व्यक्तियों तक पहुंची। डिजिटल उपकरणों और जब्त मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच भी कराई जाएगी, जिससे गिरोह के अन्य सदस्यों और संभावित पीड़ितों की पहचान की जा सके।
इस मामले में पुलिस अब भी गिरोह के कथित सरगना विद्यासागर की तलाश कर रही है। उसकी गिरफ्तारी के लिए ₹50 हजार का इनाम घोषित किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि सरगना की गिरफ्तारी के बाद गिरोह के संचालन, वित्तीय लेनदेन और अन्य राज्यों तक फैले नेटवर्क से जुड़े महत्वपूर्ण खुलासे हो सकते हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर किसी भी व्यक्ति या संस्था को बिना सत्यापन के धनराशि न दें और संदिग्ध गतिविधि की तत्काल सूचना पुलिस को दें।
प्रख्यात साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने कहा कि सरकारी नौकरी के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी में अपराधी अक्सर फर्जी दस्तावेज, नकली सत्यापन रिपोर्ट और सरकारी मोहरों का इस्तेमाल कर विश्वास पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि अभ्यर्थियों को किसी भी भर्ती प्रक्रिया की जानकारी केवल संबंधित सरकारी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या अधिकृत माध्यम से ही सत्यापित करनी चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि नौकरी के बदले धन मांगने वाले किसी भी व्यक्ति या एजेंसी से सतर्क रहें और ऐसी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं।
