फोरेंसिक ऑडिट में भुगतान रिकॉर्ड में कथित हेरफेर का खुलासा; रिश्तेदारों के बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करने और व्यापक वित्तीय साजिश की जांच शुरू

₹2.4 करोड़ अस्पताल वित्तीय घोटाला: पूर्व कर्मचारी पर छह वर्षों में धन गबन का आरोप, पुलिस ने दर्ज किया मामला

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By Roopa
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हैदराबाद: हैदराबाद के बंजारा हिल्स स्थित एक निजी अस्पताल में ₹2.4 करोड़ से अधिक की कथित वित्तीय धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि अस्पताल के एक पूर्व कर्मचारी ने लगभग छह वर्षों तक भुगतान रिकॉर्ड में हेरफेर कर संस्थान की धनराशि को अपने और अपने परिजनों से जुड़े बैंक खातों में स्थानांतरित किया। अस्पताल प्रबंधन की शिकायत के आधार पर हैदराबाद सेंट्रल क्राइम स्टेशन (CCS) ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां धन के प्रवाह, लाभार्थी बैंक खातों तथा इस कथित वित्तीय अनियमितता में अन्य व्यक्तियों की संभावित भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं।

शिकायत के अनुसार, बंजारा हिल्स स्थित विरिंची अस्पताल का संचालन करने वाली विरिंची हेल्थ केयर के कार्यकारी निदेशक सत्यनारायण वेदुला ने पुलिस को बताया कि आरोपी वर्ष 2016 से 2022 तक अस्पताल में कार्यरत था। उसे अस्पताल से जुड़े एजेंटों के पारिश्रमिक और पेशेवर शुल्क के भुगतान की प्रक्रिया संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसके कार्यों में भुगतान सूची तैयार करना, लाभार्थियों के बैंक विवरण दर्ज करना तथा बैंक को बल्क फंड ट्रांसफर फाइल भेजना शामिल था।

अस्पताल द्वारा हाल ही में कराई गई आंतरिक समीक्षा और विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट के दौरान कथित वित्तीय गड़बड़ियां सामने आईं। जांच में आरोप है कि कर्मचारी ने वास्तविक लाभार्थियों के बैंक खाते बदलकर उनकी जगह अपने, अपने पिता, भाई तथा अन्य रिश्तेदारों और परिचितों के बैंक खातों का विवरण दर्ज कर दिया। इसके चलते जिन लोगों को भुगतान किया जाना था, उनकी जगह धनराशि कथित तौर पर आरोपी और उससे जुड़े खातों में चली गई, जबकि लंबे समय तक इस हेरफेर का पता नहीं चल सका।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपी ने बैंकों की बल्क भुगतान प्रणाली में मौजूद एक प्रक्रियागत कमजोरी का फायदा उठाया। जांचकर्ताओं के अनुसार, कई मामलों में बैंक भुगतान करते समय मुख्य रूप से खाता संख्या के आधार पर लेनदेन पूरा कर देते हैं और लाभार्थी के नाम का स्वतंत्र मिलान नहीं होता। आरोप है कि आरोपी ने शुरुआत में कम रकम ट्रांसफर कर यह परखा कि हेरफेर पकड़ा जाता है या नहीं। जब उसे लगा कि अनियमितता सामने नहीं आ रही है, तो उसने बाद के वर्षों में कथित तौर पर ट्रांसफर की संख्या और रकम दोनों बढ़ा दीं।

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हालांकि आरोपी वर्ष 2022 में अस्पताल छोड़ चुका था, लेकिन कथित वित्तीय गड़बड़ी का खुलासा हाल ही में किए गए विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट के दौरान हुआ। जांच में ₹2.4 करोड़ से अधिक की कथित अनधिकृत धनराशि स्थानांतरित होने की पुष्टि होने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और राशि की बरामदगी की मांग की।

शिकायत के आधार पर हैदराबाद सेंट्रल क्राइम स्टेशन ने कर्मचारी द्वारा आपराधिक न्यासभंग, धोखाधड़ी, खातों में कूटरचना तथा आपराधिक साजिश से संबंधित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस बैंक लेनदेन, भुगतान रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक संचार का विश्लेषण कर पूरी मनी ट्रेल तैयार कर रही है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या अन्य कर्मचारी, रिश्तेदार या बाहरी सहयोगी इस कथित धन गबन में शामिल थे या उन्होंने धन छिपाने में कोई भूमिका निभाई।

Future Crime Research Foundation (FCRF) के साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थानों के भीतर होने वाली वित्तीय धोखाधड़ी अक्सर उन कर्मचारियों द्वारा की जाती है, जिन्हें भुगतान प्रणाली और वित्तीय प्रक्रियाओं तक अधिकृत पहुंच प्राप्त होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए संस्थानों को मेकर-चेकर अनुमोदन प्रणाली, लाभार्थी खातों का स्वतंत्र सत्यापन, उच्च मूल्य के लेनदेन की निरंतर निगरानी, स्वचालित संदिग्ध गतिविधि पहचान प्रणाली तथा नियमित फोरेंसिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करनी चाहिए। उनका कहना है कि भुगतान प्रक्रिया में बहु-स्तरीय सत्यापन और समय-समय पर वित्तीय रिकॉर्ड का मिलान करने से इस प्रकार की दीर्घकालिक आंतरिक वित्तीय धोखाधड़ी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है। लाभार्थी बैंक खातों को फ्रीज करने, कथित रूप से धन प्राप्त करने वाले सभी व्यक्तियों की पहचान करने तथा गबन की गई राशि की बरामदगी के प्रयास किए जा रहे हैं। जांच में यदि अन्य व्यक्तियों या किसी बड़े वित्तीय नेटवर्क की संलिप्तता सामने आती है तो उनके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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