करीब चार दशक पुराने अधिग्रहण को अदालत ने बताया धोखाधड़ी से प्रभावित; मुआवजा भुगतान, सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों में गंभीर अनियमितताओं के आधार पर आदेश निरस्त

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 10 एकड़ भूमि अधिग्रहण रद्द किया, रिकॉर्ड में हेरफेर और कथित धोखाधड़ी पर सख्त टिप्पणी

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By Roopa
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बेंगलुरु (कर्नाटक): कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु दक्षिण तालुक के होसहल्ली गांव में 10 एकड़ से अधिक भूमि के लगभग चार दशक पुराने अधिग्रहण को रद्द करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया कथित धोखाधड़ी, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर से प्रभावित रही। अदालत ने पाया कि अधिग्रहण से जुड़े दस्तावेजों और मुआवजा भुगतान के रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां हैं, जिससे पूरी कार्यवाही की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। हाईकोर्ट ने एकल पीठ के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें भूमि स्वामी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि अधिग्रहण प्रक्रिया 1989 में अंतिम रूप ले चुकी थी।

न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति टी.एम. नादाफ की खंडपीठ ने भूमि स्वामी वी. श्रीनिवासैया की अपील स्वीकार करते हुए 25 फरवरी 2025 को पारित एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया। इससे पहले एकल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹1.5 लाख का खर्च भी लगाया था। अपीलकर्ता का कहना था कि वह अब भी संबंधित भूमि के कब्जे में हैं तथा अधिग्रहण के बावजूद न तो विधिवत अवार्ड पारित किया गया और न ही उन्हें कोई मुआवजा दिया गया।

मामला बेंगलुरु के उत्तरहल्ली होबली स्थित होसहल्ली गांव की दो भूमि पार्सलों से जुड़ा है, जिनका कुल क्षेत्रफल 10 एकड़ से अधिक है। इन भूखंडों का अधिग्रहण पूर्व सैनिक हाउस बिल्डिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी के लिए प्रस्तावित किया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार द्वारा गठित जी.वी.के. राव समिति की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसने हाउस बिल्डिंग सहकारी समितियों के कामकाज की जांच की थी। समिति ने संबंधित सोसाइटी के कार्यों में कई अनियमितताएं पाई थीं और अधिग्रहण प्रस्ताव वापस लेने की सिफारिश की थी। साथ ही समिति ने सुझाव दिया था कि सोसाइटी अपने अधिकार क्षेत्र में वैकल्पिक भूमि तलाशे या सदस्यों से ली गई राशि वापस करे।

खंडपीठ ने कहा कि उसने मामले के रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण किया, जबकि इससे पहले याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रतिकूल आदेश दिए जा चुके थे। अदालत ने टिप्पणी की कि कोई भी व्यक्ति तब तक भारी न्यायिक लागत का जोखिम नहीं उठाता, जब तक उसे किसी गंभीर अन्याय या कथित धोखाधड़ी के कारण वास्तविक शिकायत न हो। इसलिए रिकॉर्ड की गहन जांच आवश्यक थी।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने 9 फरवरी 2023 को विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा जारी उस अभिलेख का भी संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया था कि सहमति अवार्ड, मुआवजा भुगतान तथा न्यायालय में मुआवजा जमा कराने से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। अदालत ने इसे अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य माना और कहा कि ऐसे दस्तावेजों का अभाव पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया पर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।

अदालत ने यह भी पाया कि कथित तौर पर भूमि का मुआवजा वास्तविक भूमि स्वामी को देने के बजाय सोसाइटी के जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) धारक को दिया गया था। जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित GPA धारक फरार बताया गया और जिस पावर ऑफ अटॉर्नी दस्तावेज के आधार पर भुगतान दर्शाया गया, उसका कोई वैध रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य भूमि अधिग्रहण के मामलों में मुआवजा भुगतान राज्य की जिम्मेदारी होती है और ऐसी अनियमितताएं पूरी प्रक्रिया की वैधता को प्रभावित करती हैं।

इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि यह मामला केवल पुराने निर्णयों की अंतिमता का नहीं, बल्कि कथित धोखाधड़ी, तथ्यों को दबाने और रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़ा है। इसलिए न्यायहित में अधिग्रहण प्रक्रिया को निरस्त करना आवश्यक है।

फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार, भूमि संबंधी धोखाधड़ी के मामलों में फर्जी दस्तावेज, रिकॉर्ड में हेरफेर और मुआवजा प्रक्रिया में अनियमितताएं लंबे समय तक कानूनी विवाद का कारण बनती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण, स्वामित्व हस्तांतरण और मुआवजा भुगतान की प्रत्येक प्रक्रिया का डिजिटल रिकॉर्ड, स्वतंत्र सत्यापन और नियमित ऑडिट सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही नागरिकों को भूमि खरीदने या किसी विवादित संपत्ति में निवेश करने से पहले राजस्व अभिलेख, पंजीकरण रिकॉर्ड और न्यायालयी दस्तावेजों का विधिवत सत्यापन अवश्य करना चाहिए।

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