नई दिल्ली: जीवनसाथी की तलाश के लिए मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म का उपयोग करने वाले लोगों को अब एक नए और अधिक खतरनाक साइबर खतरे का सामना करना पड़ रहा है। जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से साइबर अपराधी ऐसे फर्जी प्रोफाइल तैयार कर रहे हैं जिन्हें पहचानना पहले की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल हो गया है। AI से बनाई गई तस्वीरें, डीपफेक वीडियो कॉल, नकली पहचान दस्तावेज और स्वाभाविक लगने वाली बातचीत के जरिए अपराधी पहले भरोसा जीतते हैं और बाद में निवेश, आपातकालीन सहायता या अन्य बहानों से लोगों को ठगी का शिकार बनाते हैं।
हाल ही में सामने आए एक मामले में 35 वर्षीय एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म पर एक कथित आर्किटेक्ट का रिश्ता मिला। प्रोफाइल में आकर्षक तस्वीरें, सत्यापित दस्तावेज और सक्रिय सोशल मीडिया मौजूद था। कई सप्ताह तक बातचीत और वीडियो कॉल के बाद महिला ने विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) ट्रेडिंग में सुरक्षित मुनाफे का दावा करते हुए निवेश का प्रस्ताव दिया। पीड़ित ने एक कथित ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर निवेश किया, जहां शुरुआती दौर में लगातार मुनाफा दिखाया गया। लेकिन रकम निकालने का प्रयास करते ही प्लेटफॉर्म बंद हो गया। बाद की जांच में पता चला कि महिला का अस्तित्व ही नहीं था। उसकी तस्वीरें AI से तैयार की गई थीं, वीडियो कॉल डीपफेक तकनीक से संचालित थीं और पहचान दस्तावेज पूरी तरह फर्जी थे।
एक वैश्विक पहचान सत्यापन अध्ययन के अनुसार, नए रोमांस स्कैम प्रोफाइल के मामले में भारत अब दुनिया में तीसरे स्थान पर है और वैश्विक स्तर पर ऐसे लगभग 12 प्रतिशत फर्जी प्रोफाइल भारत से जुड़े पाए गए हैं।
हाल के महीनों में गुजरात और केरल समेत कई राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं। गुजरात पुलिस ने सूरत में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया, जो कथित रूप से फर्जी मैट्रिमोनियल प्रोफाइल बनाकर लोगों को फॉरेक्स निवेश के नाम पर ठग रहे थे। वहीं कोच्चि साइबर पुलिस ने भी चेतावनी दी है कि अपराधी मैट्रिमोनियल वेबसाइटों का इस्तेमाल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को निशाना बनाने के लिए कर रहे हैं।
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Algoritha Security के एक शोधकर्ता के अनुसार, पहले साइबर अपराधी चोरी की तस्वीरों और नकली नामों से फर्जी प्रोफाइल बनाते थे, लेकिन अब AI की मदद से पूरी तरह नई और वास्तविक दिखने वाली पहचान तैयार की जा रही है। इससे आम लोगों के लिए असली और नकली प्रोफाइल में अंतर करना बेहद कठिन हो गया है। उनका कहना है कि अपराधियों का उद्देश्य अभी भी वही है—पहले भरोसा जीतना और फिर पैसे या संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी हासिल करना।
साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, मैट्रिमोनियल फ्रॉड में अपराधी जल्दबाजी नहीं करते। वे नियमित बातचीत, भावनात्मक जुड़ाव और वीडियो कॉल के जरिए विश्वास कायम करते हैं। इसके बाद किसी निवेश योजना, मेडिकल इमरजेंसी, वीजा, कस्टम शुल्क या अन्य बहानों से धन मांगते हैं। उन्होंने कहा कि केवल प्रोफाइल, तस्वीरों या वीडियो कॉल के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान पर भरोसा नहीं करना चाहिए। परिवार की भागीदारी और स्वतंत्र सत्यापन अत्यंत आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यदि कोई व्यक्ति बहुत जल्दी भावनात्मक संबंध बनाने की कोशिश करे, निजी मैसेजिंग ऐप पर बातचीत ले जाए, व्यक्तिगत जानकारी मांगे, मुलाकात या परिवार से मिलने से बचे, या कम समय में निवेश अथवा आर्थिक मदद का प्रस्ताव दे, तो इसे गंभीर चेतावनी माना जाना चाहिए। अत्यधिक आकर्षक और अत्यधिक पेशेवर दिखने वाली तस्वीरें, बदलती हुई व्यक्तिगत जानकारी और असामान्य व्यवहार भी फर्जी प्रोफाइल के संकेत हो सकते हैं।
यदि कोई व्यक्ति ऐसे साइबर अपराध का शिकार हो जाए तो उसे तुरंत आरोपी से संपर्क बंद करना चाहिए, सभी चैट, स्क्रीनशॉट, भुगतान रसीद, मोबाइल नंबर और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए तथा बिना देरी किए राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए। साथ ही संबंधित मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म पर भी फर्जी प्रोफाइल की रिपोर्ट करनी चाहिए ताकि अन्य उपयोगकर्ताओं को भी ऐसे साइबर अपराध से बचाया जा सके।
