लखनऊ। उत्तर प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस (डीएल) से जुड़े कार्यों के संचालन को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। डीएल बनाने और प्रिंटिंग का कार्य करने वाले निजी कर्मचारियों ने सेवा प्रदाता एजेंसियों पर नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये वसूलने और महीनों तक वेतन न देने के गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित कर्मचारियों का दावा है कि उनसे नौकरी बनाए रखने और दोबारा नियुक्ति देने के नाम पर प्रति व्यक्ति ₹3 लाख तक की रकम ली गई। 40 कर्मचारियों से कथित रूप से कुल ₹1.20 करोड़ की वसूली का आरोप लगाया गया है। मामले को लेकर कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री को शिकायत भेजकर जांच और कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, यह पूरा मामला परिवहन विभाग से जुड़े उस कार्य से संबंधित है, जिसके तहत ड्राइविंग लाइसेंस बनाने, डेटा प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग का काम निजी एजेंसियों के माध्यम से कराया जाता है। कर्मचारियों का आरोप है कि इस व्यवस्था का लाभ उठाकर कुछ एजेंसियों ने कथित तौर पर भर्ती और पुनर्नियुक्ति प्रक्रिया को कमाई का माध्यम बना लिया।
बताया गया है कि प्रदेश में डीएल निर्माण और उससे जुड़े कार्यों का संचालन तीन सेवा प्रदाता एजेंसियों के माध्यम से किया जाता है। इन एजेंसियों के जरिए बड़ी संख्या में निजी कर्मचारी विभिन्न क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों और संबंधित केंद्रों पर कार्यरत हैं। पीड़ित कर्मचारियों का आरोप है कि पिछले वर्ष नवंबर में बड़ी संख्या में कर्मियों को अचानक दलाल बताकर सेवा से हटा दिया गया था, जिससे सैकड़ों परिवारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया।
कर्मचारियों के अनुसार, बाद में इन्हीं कर्मियों को दोबारा काम पर रखने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौरान नई भर्तियां भी की गईं। आरोप है कि पुनर्नियुक्ति और नई नियुक्तियों के दौरान उम्मीदवारों से भारी रकम की मांग की गई। शिकायत में दावा किया गया है कि प्रत्येक कर्मचारी से लगभग ₹3 लाख वसूले गए। 40 कर्मचारियों के मामले में यह राशि करीब ₹1.20 करोड़ बैठती है।
पीड़ितों का कहना है कि नौकरी बचाने और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण कई लोगों ने मजबूरी में रकम की व्यवस्था की। हालांकि बाद में जब कुछ कर्मचारियों ने वेतन से कटौती या अतिरिक्त भुगतान करने से इनकार किया, तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। कर्मचारियों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और इसमें कई स्तरों पर अनियमितताएं हुईं।
मामले को और गंभीर बनाते हुए कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि उनसे पिछले सात महीनों से लगातार काम कराया जा रहा है, लेकिन उन्हें नियमित वेतन नहीं दिया गया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि सात महीने की अवधि में अधिकांश कर्मियों को केवल एक महीने का वेतन मिला है। इससे उनके सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है और कई कर्मचारी कर्ज तथा अन्य वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि उन्होंने संबंधित एजेंसियों के खिलाफ कई बार शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसी कारण उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को प्रार्थना पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की है। शिकायत में निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने तथा बकाया वेतन दिलाने की मांग भी की गई है।
सूत्रों के अनुसार, एजेंसियों द्वारा लागत कम करने और मानव संसाधन पर होने वाले खर्च में कटौती की योजनाओं को लेकर भी कर्मचारियों में असंतोष है। कर्मचारियों का आरोप है कि जिन संसाधनों का उपयोग उनके वेतन और सुविधाओं पर होना चाहिए था, उनका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। इससे कार्यस्थलों पर असुरक्षा और असंतोष का माहौल बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भर्ती के नाम पर धन वसूली और वेतन भुगतान में अनियमितता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं बल्कि सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कार्यों में जवाबदेही का भी गंभीर प्रश्न बन सकता है। फिलहाल कर्मचारियों द्वारा मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत के बाद मामले पर सभी की नजरें टिकी हैं। संबंधित आरोपों की आधिकारिक जांच के बाद ही पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
