नई दिल्ली। भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी जिन संरक्षित स्मारकों और पुरास्थलों पर है, वहीं से बीते छह दशकों में सैकड़ों अमूल्य कलाकृतियों के गायब होने का मामला सामने आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के रिकॉर्ड के अनुसार देशभर के संरक्षित परिसरों से कम से कम 488 प्राचीन कलाकृतियां, मूर्तियां, प्रतिमाएं और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं चोरी हो चुकी हैं। इनमें से 420 से अधिक धरोहरें आज भी लापता हैं, जिससे देश की विरासत संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1961 से लेकर 2024 तक 19 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में ASI के संरक्षण वाले परिसरों से चोरी की घटनाएं दर्ज की गईं। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इन तीन राज्यों में ही 319 कलाकृतियों की चोरी दर्ज हुई, जो कुल मामलों का लगभग 65 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राचीन मूर्तियों और दुर्लभ पुरावशेषों की अंतरराष्ट्रीय मांग के कारण इन क्षेत्रों को लंबे समय से तस्कर गिरोहों द्वारा निशाना बनाया जाता रहा है।
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रिकॉर्ड बताते हैं कि चोरी की घटनाएं मंदिर परिसरों, किलों, संग्रहालयों और मूर्ति संरक्षण शेडों से हुईं। कई मामले ऐसे हैं जो दशकों पुराने हैं और आज तक उनका समाधान नहीं हो सका है। सूची में दर्ज सबसे पुराना मामला बिहार के नालंदा संग्रहालय से जुड़ा है, जहां वर्ष 1961 में बुद्ध और बोधिसत्व की 15 प्राचीन मूर्तियां चोरी हो गई थीं। छह दशक से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद इन मूर्तियों का कोई पता नहीं चल पाया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्राचीन कलाकृतियों की चोरी केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान पर हमला भी है। एक दुर्लभ मूर्ति या ऐतिहासिक वस्तु के गायब होने का मतलब केवल उसकी आर्थिक कीमत का नुकसान नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ा इतिहास, कला और सभ्यता का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर में सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा को राष्ट्रीय महत्व का विषय माना जाता है।
स्थिति को और चिंताजनक बनाता है यह तथ्य कि चोरी हुई कई वस्तुओं की तस्वीरें या विस्तृत अभिलेख ASI के पास उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे मामलों में चोरी के बाद उनकी पहचान करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी खोज करना बेहद मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्याप्त दस्तावेजीकरण की कमी बरामदगी की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।
ASI देशभर में 3,697 संरक्षित स्मारकों और पुरास्थलों की देखरेख करता है। इनमें से अनेक स्थल विशाल क्षेत्र में फैले हुए हैं और कई दूरदराज इलाकों में स्थित हैं। सीमित सुरक्षा संसाधन, मानवबल की कमी और लगातार निगरानी की चुनौतियां भी धरोहर संरक्षण को प्रभावित करती हैं। हालांकि हाल के वर्षों में सुरक्षा उपायों को मजबूत करने, डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने और निगरानी प्रणालियों को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए हैं।
चोरी हुई महत्वपूर्ण वस्तुओं में आंध्र प्रदेश के श्री मल्लिकार्जुन मंदिर की 10वीं शताब्दी की कमल आकृति, कर्नाटक के अवनी स्थित रामलिंगेश्वर मंदिर परिसर से नंदी की प्रतिमा, मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित वृद्ध कालेश्वर मंदिर से विष्णु की मूर्ति तथा दिल्ली के भारतीय युद्ध स्मारक से मुगलकालीन हाथीदांत जड़ित कटार शामिल हैं। इन सभी का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पुरातत्व विशेषज्ञों का सुझाव है कि सभी संरक्षित धरोहरों का उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल अभिलेखीकरण, त्रि-आयामी स्कैनिंग और केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए। इससे चोरी की स्थिति में पहचान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैकिंग आसान हो सकेगी। फिलहाल सैकड़ों लापता कलाकृतियों की बरामदगी भारतीय विरासत संरक्षण तंत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और इन अमूल्य धरोहरों की वापसी आज भी देश की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं में शामिल है।
