डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड रोकने के लिए सरकार ने WhatsApp में डिवाइस-लेवल ब्लॉकिंग और मजबूत एंटी-फ्रॉड सिस्टम का प्रस्ताव रखा है।

WhatsApp में डिवाइस-लेवल ब्लॉकिंग की तैयारी, डिजिटल अरेस्ट स्कैम रोकने के लिए सरकार का बड़ा प्रस्ताव

Team The420
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डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के बढ़ते मामलों के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी है कि WhatsApp अब ऐसे स्कैम नेटवर्क को रोकने के लिए डिवाइस-लेवल ब्लॉकिंग की संभावना पर विचार कर रहा है। यह कदम उन संगठित साइबर अपराध नेटवर्क्स के खिलाफ एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जो लगातार नए नंबर और अकाउंट बनाकर ठगी को अंजाम देते हैं।

गृह मंत्रालय की ओर से अदालत में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि साइबर अपराधी अक्सर एक ही मोबाइल डिवाइस का इस्तेमाल करते हुए अलग-अलग सिम कार्ड और अकाउंट बदलते रहते हैं। डिवाइस आईडी ब्लॉकिंग से इस पैटर्न को तोड़ने और नेटवर्क को निष्क्रिय करने में मदद मिल सकती है।

यह मामला 12 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश सुर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार एक ऐसा समन्वित ढांचा तैयार करने पर काम कर रही है, जिसमें टेक प्लेटफॉर्म्स, बैंकिंग सिस्टम, टेलीकॉम कंपनियां और जांच एजेंसियां एक साथ मिलकर साइबर अपराधों से निपटें।

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सरकारी जानकारी के अनुसार, जनवरी से शुरू हुए 12 सप्ताह के भीतर 9,400 से अधिक ऐसे अकाउंट ब्लॉक किए गए हैं जो साइबर फ्रॉड से जुड़े पाए गए। यह कार्रवाई भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा दूरसंचार विभाग से मिले इनपुट के आधार पर की गई।

जांच एजेंसियों ने पाया है कि इन स्कैम नेटवर्क्स का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशिया, खासकर कंबोडिया से संचालित संगठित गिरोहों से जुड़ा हो सकता है। ये गिरोह खुद को “दिल्ली पुलिस”, “CBI” या “ATS” जैसी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और डिजिटल अरेस्ट के नाम पर पैसे ऐंठते हैं।

इन खतरों से निपटने के लिए WhatsApp ने कई AI आधारित तकनीकों को भी लागू किया है। इनमें फर्जी पहचान पकड़ने के लिए लोगो मैचिंग सिस्टम, संदिग्ध नामों की निगरानी और मशीन लर्निंग मॉडल शामिल हैं, जो नए पैटर्न वाले स्कैम को पहचानने में मदद करते हैं। इसके अलावा, नए यूजर के पहले मैसेज पर चेतावनी, अकाउंट की उम्र दिखाना और प्रोफाइल फोटो एक्सेस पर प्रतिबंध जैसे फीचर्स भी जोड़े गए हैं।

सरकार का मानना है कि यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से सभी प्लेटफॉर्म्स पर लागू किया जाए, तो साइबर फ्रॉड की घटनाओं में बड़ी कमी आ सकती है। हालांकि, संकेत मिले हैं कि आने वाले समय में ऐसे सुरक्षा उपाय केवल मैसेजिंग ऐप तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि एक व्यापक डिजिटल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का हिस्सा बन सकते हैं।

टेक्नोलॉजी पॉलिसी विशेषज्ञ सुमेश श्रीवास्तव (The Quantum Hub) ने कहा कि ये कदम वास्तविक समस्या को संबोधित करते हैं, लेकिन इससे प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी की परिभाषा भी बदल रही है। उनके अनुसार, अदालत के जरिए ऐसे नियम तय होना लंबे समय में रेगुलेशन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

वहीं विशेषज्ञों ने डिवाइस-लेवल ब्लॉकिंग को लेकर दीर्घकालिक चिंताएं भी जताई हैं, जिसमें निगरानी और डिजिटल नियंत्रण के विस्तार की संभावना शामिल है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के तहत संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर अस्थायी डेबिट होल्ड और बैंकों के बीच तेज समन्वय की आवश्यकता है, ताकि फंड डाइवर्जन को रोका जा सके और पीड़ितों की रकम वापस मिलने की संभावना बढ़े।

कानूनी विशेषज्ञों ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के प्रावधानों की समीक्षा की आवश्यकता भी बताई है, ताकि साइबर फ्रॉड नेटवर्क्स पर सख्त कार्रवाई की जा सके। दूरसंचार विभाग को सिम वेरिफिकेशन सिस्टम मजबूत करने और संदिग्ध नंबरों की पहचान तेज करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

हालांकि डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस दिशा पर चिंता जताई है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अपार गुप्ता ने कहा कि इस तरह के कदम संवैधानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया के जरिए प्रशासनिक निगरानी का विस्तार विधायी बहस को प्रभावित कर सकता है।

सरकारी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश में साइबर अपराध से हुए नुकसान में तेज वृद्धि हुई है, और 2024 में यह आंकड़ा ₹22,845 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि 22 लाख से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं।

अधिकारियों ने साफ किया है कि तकनीकी उपायों के साथ-साथ जागरूकता भी सबसे जरूरी सुरक्षा कवच है। नागरिकों को अनजान कॉल, संदिग्ध मैसेज और वित्तीय जानकारी साझा करने से बचने की सलाह दी गई है।

फिलहाल सरकार, टेक कंपनियां और जांच एजेंसियां मिलकर एक ऐसे एकीकृत साइबर सुरक्षा ढांचे की ओर बढ़ रही हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के जरिए बढ़ते ऑनलाइन फ्रॉड नेटवर्क पर अंकुश लगाने में मदद कर सके।

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