सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)। जिले में साइबर ठगी से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) आईडी के कथित दुरुपयोग के चलते कई राज्यों से मिले अलर्ट के बाद एक बैंक खाता फ्रीज कर दिया गया। पुलिस ने इस मामले में पूर्व जिला प्रबंधक आशीष पांडे के खिलाफ केस दर्ज किया है। आरोप है कि एक निष्क्रिय CSC लॉगिन का उपयोग मूल धारक की जानकारी के बिना किया गया, जिससे संदिग्ध वित्तीय लेन-देन सामने आए।
जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता प्रेम बहादुर यादव, जो जिला सूचना कार्यालय में नेटवर्क फील्ड इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं, ने बताया कि उन्होंने निजी उपयोग के लिए एक CSC आईडी बनवाई थी। बाद में तकनीकी समस्या आने पर वर्ष 2017 में उन्होंने उस आईडी की लॉगिन जानकारी तत्कालीन जिला प्रबंधक आशीष पांडे को रिएक्टिवेशन और तकनीकी सुधार के लिए दी थी। लेकिन आरोप है कि इसके बाद यह आईडी वापस नहीं की गई और उस पर नियंत्रण बना रहा।
मामला तब सामने आया जब शिकायतकर्ता को अलग-अलग राज्यों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों से नोटिस मिलने लगे, जिनमें उनके बैंक खाते से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों का उल्लेख था। जनवरी 2026 में गुजरात के तापी जिले की साइबर यूनिट ने लगभग ₹90,000 के एक संदिग्ध क्रेडिट ट्रांजैक्शन को चिन्हित करते हुए नोटिस जारी किया। इसके बाद बैंक ने खाते पर निगरानी बढ़ा दी और लेन-देन पर रोक लगा दी।
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इसके कुछ ही समय बाद अप्रैल 2026 में हरियाणा के भिवानी साइबर क्राइम यूनिट से दूसरा अलर्ट आया, जिसमें करीब ₹95,000 के संदिग्ध ट्रांजैक्शन की जानकारी दी गई। लगातार अलग-अलग राज्यों से मिले इनपुट के बाद बैंक ने खाते को पूरी तरह फ्रीज कर दिया। कुल मिलाकर यह संदिग्ध राशि लगभग ₹1.85 लाख तक पहुंची, जिससे एक संभावित संगठित दुरुपयोग की आशंका गहराई है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि CSC आईडी का इस्तेमाल किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जिससे वित्तीय सिस्टम या डिजिटल सेवाओं तक अनधिकृत पहुंच बनाई गई। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ठगी का पूरा तरीका क्या था, लेकिन अधिकारी यह जांच कर रहे हैं कि क्या इस लॉगिन का उपयोग फर्जी खाते बनाने या धन को अलग-अलग माध्यमों से घुमाने के लिए किया गया।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, शिकायत के आधार पर औपचारिक केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। डिजिटल लॉग, एक्सेस रिकॉर्ड और बैंक ट्रांजैक्शन हिस्ट्री की गहन जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि CSC क्रेडेंशियल्स का इस्तेमाल किस प्रकार किया गया। साथ ही गुजरात और हरियाणा की साइबर इकाइयों से भी समन्वय किया जा रहा है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उनका इस कथित धोखाधड़ी से कोई संबंध नहीं है और उन्हें इसकी जानकारी तब हुई जब बैंक खाते पर रोक लगी और बाहरी एजेंसियों से नोटिस प्राप्त हुए। उन्होंने CSC आईडी के उपयोग का पूरा फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग की है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामले दिखाते हैं कि डिजिटल पहचान और सरकारी पोर्टल लॉगिन के साझा या अनियंत्रित उपयोग से गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। अगर क्रेडेंशियल्स पर निगरानी न हो तो उनका इस्तेमाल फर्जीवाड़ा, पहचान की चोरी और वित्तीय अपराधों में किया जा सकता है।
फिलहाल जांच एजेंसियां इस मामले को एक बड़े पैटर्न के हिस्से के रूप में देख रही हैं, जिसमें डिजिटल आईडी का इस्तेमाल कर वित्तीय लेन-देन में गुमनामी बनाई जाती है। जांच जारी है और उम्मीद है कि आगे इसमें और लोगों या नेटवर्क की भूमिका भी सामने आ सकती है।
