गांधीनगर: गुजरात के गांधीनगर में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वीज़ा धोखाधड़ी मामले का खुलासा हुआ है, जिसमें एक वीज़ा कंसल्टेंट और उसके 33 ग्राहकों सहित कुल 11 से अधिक लोगों से करीब ₹3.4 करोड़ की ठगी किए जाने का आरोप है। इस पूरे मामले में आरोपियों ने खुद को प्रभावशाली प्रोफेशनल बताकर यूके वर्क परमिट दिलाने का झांसा दिया और बाद में फरार हो गए।
विदेशी शिक्षा लोन के संपर्क से शुरू हुआ जाल
शिकायत के अनुसार, 31 वर्षीय वीज़ा कंसल्टेंट लंबे समय से कुदासन क्षेत्र में अपनी फर्म चला रहा था। वर्ष 2022 में उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई, जिसने खुद को विदेशी शिक्षा लोन से जुड़े व्यवसाय में बताया। बाद में उसी व्यक्ति ने एक अन्य सहयोगी से परिचय कराया, जिसने दावा किया कि उसके पास यूके में वर्क परमिट और नौकरी दिलाने के मजबूत संपर्क हैं।
आरोपियों ने दावा किया कि वे यूके के वेयरहाउस, हेल्थकेयर और रेस्टोरेंट सेक्टर में नौकरी दिला सकते हैं। इन दावों पर भरोसा करते हुए कंसल्टेंट ने जुलाई 2025 से अपने ग्राहकों के आवेदन उनके पास भेजने शुरू कर दिए। इसके बदले में बैंक ट्रांसफर और नकद दोनों माध्यमों से बड़ी रकम ली गई, जो अलग-अलग खातों में भेजी गई।
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व्हाट्सएप पर भेजे गए फर्जी CoS दस्तावेज
जैसे-जैसे समय बीतता गया, वीज़ा प्रक्रिया में देरी होने लगी। इस दौरान आरोपियों ने कंसल्टेंट को भरोसा दिलाने के लिए व्हाट्सएप पर कथित तौर पर Certificate of Sponsorship (CoS) दस्तावेज भी भेजे, जिन्हें बाद में जांच में फर्जी पाया गया।
अक्टूबर 2025 के बाद जब लगातार देरी जारी रही, तो शिकायतकर्ता ने सवाल उठाने शुरू किए। शुरुआत में आरोपियों ने गोलमोल जवाब देकर मामला टालने की कोशिश की और कहा कि प्रक्रिया में समय लगेगा। बाद में उन्होंने खुद को विदेश में होने का दावा कर संपर्क से दूरी बना ली।
33 ग्राहकों के दस्तावेज और रकम फंसी
जांच में सामने आया कि कुल 33 ग्राहकों के दस्तावेज और धनराशि इस नेटवर्क के जरिए अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई। जब कई ग्राहकों के वीज़ा अस्वीकृत या लंबित पाए गए, तो पूरा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ।
पीड़ित कंसल्टेंट ने बताया कि उसे करीब ₹3.4 करोड़ का नुकसान हुआ है, जिसमें ₹1.7 करोड़ एक आरोपी को और ₹1.6 करोड़ दूसरे आरोपी को दिए गए थे। उसने सभी बैंक रिकॉर्ड और फर्जी दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए हैं।
बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की जांच
पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और आरोपियों के बैंक खातों, डिजिटल ट्रांजैक्शन और कॉल रिकॉर्ड्स की गहन जांच की जा रही है। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि यह एक संगठित अंतरराज्यीय नेटवर्क हो सकता है, जो फर्जी दस्तावेजों के जरिए विदेश भेजने के नाम पर ठगी करता था।
अधिकारियों के अनुसार, यह गिरोह सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्कों के माध्यम से लोगों को भरोसे में लेकर बड़ी योजनाबद्ध तरीके से ठगी करता था। नकली कंपनियों और फर्जी दस्तावेजों के जरिए यह भ्रम पैदा किया जाता था कि आवेदन वास्तविक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
अन्य राज्यों में नेटवर्क की जांच
पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि क्या इस नेटवर्क ने अन्य राज्यों में भी इसी तरह के मामलों को अंजाम दिया है। डिजिटल फॉरेंसिक टीमों को वित्तीय लेनदेन के ट्रेल और मनी फ्लो को ट्रैक करने में लगाया गया है।
अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी विदेशी नौकरी या वीज़ा ऑफर को बिना सत्यापन स्वीकार न करें और केवल अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से ही प्रक्रिया अपनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में फर्जी CoS और नकली दस्तावेज सबसे बड़ा हथियार बनते हैं।
यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय रोजगार के नाम पर चल रहे संगठित धोखाधड़ी नेटवर्क किस तरह लोगों की उम्मीदों और पैसों का शोषण कर रहे हैं, और सतर्कता ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
