नवी मुंबई। महाराष्ट्र के नवी मुंबई में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ लोगों को हैरान किया है, बल्कि साइबर अपराध के बदलते स्वरूप पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक 62 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक को बीमा पॉलिसी के रिफंड का झांसा देकर करीब ₹64 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। खास बात यह है कि यह ठगी एक-दो दिन में नहीं, बल्कि पूरे चार साल तक बेहद सुनियोजित तरीके से चलती रही।
पीड़ित के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत जनवरी 2022 में एक व्हाट्सऐप कॉल से हुई थी। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को बीमा नियामक संस्था का अधिकारी बताया और दावा किया कि वह उनकी मैच्योर हो चुकी पॉलिसी का पैसा दिलाने में मदद कर सकता है। शुरुआत में बातचीत इतनी पेशेवर और भरोसेमंद थी कि पीड़ित को किसी तरह का संदेह नहीं हुआ।
रिफंड के नाम पर शुरू हुआ भरोसे का जाल
ठगों ने पीड़ित को बताया कि पॉलिसी की राशि निकालने के लिए कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, जिसमें नई बीमा पॉलिसियां खरीदना भी शामिल है। शुरुआत में छोटी रकम मांगी गई, जिससे पीड़ित का भरोसा और मजबूत होता गया।
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कुछ समय बाद एक अन्य व्यक्ति ने संपर्क किया और खुद को ‘इंटीग्रेटेड ग्रीवांस मैनेजमेंट सिस्टम (IGMS)’ का निदेशक बताया। उसने आश्वासन दिया कि पहले दिए गए पैसे वापस दिला दिए जाएंगे, लेकिन इसके लिए कुछ और प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इस तरह पीड़ित धीरे-धीरे ठगों के जाल में गहराई तक फंसता चला गया।
फर्जी चार्ज के नाम पर लगातार वसूली
ठगों ने अलग-अलग बहानों से पैसे ऐंठने का सिलसिला जारी रखा। कभी ‘एजेंट कोड रिमूवल फीस’, कभी ‘एफडीआर चार्ज’, तो कभी ‘स्टेट लेवल टैक्स’ के नाम पर पैसे मांगे जाते रहे। हर बार यह भरोसा दिलाया जाता कि यह अंतिम भुगतान है और इसके बाद पूरी रकम वापस मिल जाएगी।
चार वर्षों के दौरान कुल 32 अलग-अलग ट्रांजैक्शन में पीड़ित और उसके भाई के बैंक खातों से करीब ₹64 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए। यह पूरा खेल इतनी चतुराई से खेला गया कि पीड़ित को लंबे समय तक ठगी का एहसास ही नहीं हुआ।
कानूनी नोटिस ने खोली ठगी की परतें
मामले का खुलासा तब हुआ जब पीड़ित को केरल के एक पुलिस स्टेशन से कानूनी नोटिस मिला। नोटिस में बताया गया कि उनके बैंक खाते का इस्तेमाल संदिग्ध गतिविधियों में हो रहा है। इसके बाद पीड़ित को शक हुआ और उन्होंने पूरे मामले की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी।
20 अप्रैल को इस मामले में शिकायत दर्ज की गई है और जांच शुरू कर दी गई है। अब डिजिटल ट्रांजैक्शन, कॉल रिकॉर्ड और बैंक खातों के जरिए आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।
साइबर अपराध का नया ‘लॉन्ग-टर्म मॉडल’
यह मामला साफ तौर पर दर्शाता है कि साइबर अपराध अब केवल एक बार की ठगी तक सीमित नहीं है। अब अपराधी लंबे समय तक चलने वाले ‘लॉन्ग-टर्म स्कैम’ का सहारा ले रहे हैं, जिसमें पहले भरोसा जीता जाता है और फिर धीरे-धीरे बड़ी रकम निकाली जाती है।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है, “आजकल साइबर अपराधी सोशल इंजीनियरिंग का बेहद सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। वे पीड़ित के भरोसे को धीरे-धीरे मजबूत करते हैं और फिर किस्तों में ठगी को अंजाम देते हैं। ऐसे मामलों में अपराधी खुद को सरकारी अधिकारी या संस्थान से जुड़ा बताकर विश्वसनीयता बढ़ाते हैं, जो सबसे खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है।”
कैसे बचें ऐसे साइबर जाल से
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अनजान कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। अगर कोई खुद को सरकारी अधिकारी या नियामक संस्था का प्रतिनिधि बताता है, तो उसकी पहचान आधिकारिक स्रोतों से जरूर जांचें।
किसी भी प्रकार की फीस या टैक्स के नाम पर बार-बार पैसे ट्रांसफर करने से बचें। अगर कोई व्यक्ति लगातार भुगतान करने के लिए कह रहा है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि मामला संदिग्ध हो सकता है।
जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा
यह घटना बताती है कि साइबर ठगी अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी खेली जा रही है। अपराधी लोगों के भरोसे और जरूरतों का फायदा उठाकर उन्हें जाल में फंसा रहे हैं।
ऐसे मामलों में समय रहते शिकायत दर्ज कराना बेहद जरूरी है, ताकि ट्रांजैक्शन को ट्रैक कर रिकवरी की संभावना बढ़ाई जा सके। साथ ही, आम लोगों के लिए जागरूक रहना ही सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय है, जिससे वे इस तरह के साइबर जाल से खुद को बचा सकें।
