गुजरात साइबर सेल ने एक बड़ी कार्रवाई में म्यूल बैंक अकाउंट नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जो कथित तौर पर चीन मूल के साइबर अपराध गिरोहों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय ठगी सिंडिकेट का हिस्सा बताया जा रहा है। यह नेटवर्क कंबोडिया, थाईलैंड और म्यांमार जैसे देशों से संचालित अवैध कॉल सेंटरों के जरिए भारतीय नागरिकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहा था।
जांच में सामने आया है कि यह गिरोह ‘डिजिटल अरेस्ट’, ऑनलाइन ठगी और वित्तीय धोखाधड़ी के जरिए वसूली गई रकम को भारत में मौजूद म्यूल बैंक खातों के माध्यम से आगे ट्रांसफर करता था। इसके बाद धनराशि को आंगड़िया नेटवर्क और क्रिप्टोकरेंसी चैनलों के जरिए अलग-अलग स्थानों पर घुमाकर छिपाया जाता था।
तकनीकी इनपुट के आधार पर की गई इस समन्वित कार्रवाई में साइबर क्राइम यूनिट ने सूरत, भावनगर, राजकोट और ऊंझा से आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह अभियान कई शहरों में एक साथ चलाया गया, जिसमें डिजिटल निगरानी और वित्तीय ट्रांजैक्शन ट्रैकिंग का उपयोग किया गया।
सूरत और भावनगर से गिरफ्तार किए गए आरोपियों मुकेश मेर और फर्दिन खान पठान के पास से चार मोबाइल फोन, एक लैपटॉप और बैंकिंग दस्तावेज बरामद किए गए। जांच में यह भी पता चला कि लैपटॉप में लगभग 125 कंपनियों की जानकारी मौजूद थी, जिनका उपयोग फर्जी तरीके से बैंक खाते खोलने में किया गया था। इनमें से कई खाते पहले से सक्रिय थे।
इन खातों के जरिए करीब ₹174 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन का खुलासा हुआ है, जिसने जांच एजेंसियों को चौंका दिया है।
एक अन्य कार्रवाई में ऊंझा से अक्षय पटेल और देवेंद्र पटेल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, इनके द्वारा संचालित म्यूल अकाउंट्स के माध्यम से लगभग ₹114 करोड़ की राशि का लेनदेन किया गया था, जिसे अलग-अलग खातों में घुमाकर छिपाने की कोशिश की गई।
राजकोट से गिरफ्तार किए गए आरोपियों में चेतन अमलानी, जतिन कक्कड़, कपिल कोटक और महेंद्र कोकिया शामिल हैं। इन्हें इस पूरे नेटवर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जो स्थानीय स्तर पर बैंक खातों की व्यवस्था और ट्रांजैक्शन मैनेजमेंट में मदद कर रहे थे।
अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई एक सतत अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उन म्यूल अकाउंट नेटवर्क को खत्म करना है जो अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों और स्थानीय बैंकिंग सिस्टम के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस तरह के नेटवर्क में पैसे को कई परतों (लेयरिंग) के जरिए अलग-अलग खातों में घुमाया जाता है, जिससे असली स्रोत का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, जांच अभी जारी है और डिजिटल सबूतों व वित्तीय ट्रांजैक्शन के विश्लेषण के बाद और गिरफ्तारियां संभव हैं।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि जांच में डिजिटल वॉलेट और क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल के प्रमाण मिले हैं, जिनका उपयोग ट्रांजैक्शन ट्रेसिंग से बचने के लिए किया जाता था।
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गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को निशाना बनाकर उनके बैंक खाते, सिम कार्ड और पहचान दस्तावेज हासिल करता था, जिन्हें बड़े पैमाने पर साइबर ठगी में इस्तेमाल किया जाता था।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, तेज डिजिटल ट्रांजैक्शन और क्रिप्टो नेटवर्क के कारण ऐसे अपराधी नेटवर्क को ट्रैक करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
साइबर एजेंसियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति को बैंक विवरण या व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी न दें और संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत रिपोर्ट करें।
विशेषज्ञों के अनुसार, म्यूल अकाउंट नेटवर्क आज अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध की रीढ़ बन चुके हैं, जो वैश्विक स्तर पर वित्तीय नुकसान का बड़ा कारण बन रहे हैं।
जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क के अन्य राज्यों और संभावित अंतरराष्ट्रीय लिंक की पहचान में जुटी हैं, जिससे पूरे सिंडिकेट की परतें खोली जा सकें।
