मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में साइबर ठगी का ग्राफ लगातार चिंता बढ़ा रहा है। वर्ष 2025 में शहर के निवासियों को साइबर फ्रॉड के कारण ₹1,000 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ, जबकि पुलिस और संबंधित एजेंसियां मिलकर केवल ₹110 करोड़ की ही वसूली या फ्रीज कर पाईं।
मुंबई पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में कुल 4,825 साइबर फ्रॉड के मामले दर्ज किए गए, जो पिछले कुछ वर्षों में सबसे अधिक हैं। इनमें से 1,542 मामलों का पता लगाया गया और 1,410 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। कुल मिलाकर इस वर्ष साइबर ठगी से जुड़े मामलों में ₹1,031 करोड़ की राशि शामिल थी, जिसमें से केवल ₹110 करोड़ ही वापस या फ्रीज हो सकी।
पिछले तीन वर्षों के आंकड़े भी साइबर अपराध में लगातार वृद्धि को दर्शाते हैं। वर्ष 2022 में 4,717 मामले दर्ज हुए, जिनमें 393 मामलों का खुलासा हुआ और 573 गिरफ्तारियां हुईं। वर्ष 2023 में मामले घटकर 4,169 रह गए, लेकिन जांच और गिरफ्तारियों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं 2024 में मामलों की संख्या फिर बढ़कर 5,087 तक पहुंच गई, जिसमें 1,253 मामलों का खुलासा और 1,294 गिरफ्तारियां हुईं।
अधिकारियों के अनुसार, साइबर ठगी के मामलों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण डिजिटल सेवाओं का तेजी से विस्तार और अपराधियों द्वारा अपनाई जा रही उन्नत तकनीकें हैं। इनमें फिशिंग लिंक, फर्जी निवेश योजनाएं, नकली कस्टमर केयर कॉल और डिजिटल अरेस्ट जैसे तरीके प्रमुख रूप से शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अब सोशल इंजीनियरिंग और ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल कर लोगों को झांसे में ले रहे हैं। वे डर, लालच या तुरंत कार्रवाई के दबाव का इस्तेमाल कर पीड़ितों से पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। एक बार पैसा ट्रांसफर होने के बाद उसे अलग-अलग बैंक खातों और डिजिटल वॉलेट्स के जरिए तेजी से घुमा दिया जाता है, जिससे ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जागरूकता अभियान और त्वरित शिकायत दर्ज होने से कुछ मामलों में रिकवरी संभव हुई है, लेकिन कुल नुकसान के मुकाबले यह बेहद कम है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, लिंक या संदेश पर तुरंत भरोसा न करें और बैंकिंग जानकारी साझा करने से पहले पूरी जांच करें।
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आंकड़ों से यह भी साफ है कि साइबर अपराध और वित्तीय रिकवरी के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है, जिससे डिजिटल वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुंबई जैसे महानगर में यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है क्योंकि यहां डिजिटल लेनदेन की मात्रा सबसे अधिक है।
पीड़ितों में वेतनभोगी कर्मचारी, वरिष्ठ नागरिक और छोटे व्यापारी प्रमुख रूप से शामिल हैं। उन्हें अक्सर फर्जी निवेश योजनाओं, नकली बैंक अधिकारियों की कॉल और डिजिटल गिरफ्तारी के नाम पर निशाना बनाया जाता है। कई मामलों में शिकायत दर्ज करने में देरी होने के कारण पैसा वापस मिलने की संभावना कम हो जाती है।
बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने इस चुनौती से निपटने के लिए रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम और सख्त वेरिफिकेशन प्रक्रियाएं लागू की हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी संदिग्ध लेनदेन की त्वरित रिपोर्टिंग और विवाद निपटान प्रणाली को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सीमापार साइबर अपराध, म्यूल अकाउंट्स और गुमनाम भुगतान चैनलों के कारण जांच एजेंसियों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बैंक, टेलीकॉम कंपनियों और साइबर सेल के बीच समन्वय भी कई बार धीमा हो जाता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जैसे-जैसे भारत का डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ठगी के तरीके भी अधिक उन्नत हो रहे हैं। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित स्कैम, डीपफेक कॉल और ऑटोमेटेड फिशिंग नेटवर्क शामिल हैं।
कुल मिलाकर, मुंबई में बढ़ते साइबर फ्रॉड के मामले यह दिखाते हैं कि तकनीक के साथ-साथ सुरक्षा और जागरूकता को भी समान रूप से मजबूत करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल समन्वित प्रयासों से ही इस बढ़ते खतरे पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
