गुरुग्राम में ₹20 लाख सरकारी ग्रांट विवाद में कोर्ट ने पूर्व मंत्री सुखबीर कटारिया और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश दिए

‘ग्रांट’ से ‘घोटाले’ तक: ₹20 लाख फंड पर विवाद, कोर्ट ने FIR दर्ज करने को कहा

Team The420
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गुरुग्राम। हरियाणा के गुरुग्राम में कथित ₹20 लाख सरकारी ग्रांट मामले ने तूल पकड़ लिया है, जहां एक स्थानीय अदालत ने पूर्व मंत्री सुखबीर कटारिया और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मामले में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और इनमें सार्वजनिक धन के दुरुपयोग तथा पद के दुरुपयोग की आशंका दिखाई देती है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है।

यह मामला एक स्थानीय निवासी ओम प्रकाश द्वारा दायर याचिका से सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया कि वर्ष 2014 से 2019 के बीच मंत्री पद पर रहते हुए सुखबीर कटारिया ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए एक महिला परिचित को ₹20 लाख की सरकारी ग्रांट दिलवाई। यह ग्रांट आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए मकान निर्माण और मरम्मत हेतु निर्धारित थी, लेकिन शिकायत के अनुसार इसका लाभ ऐसे व्यक्ति को दिया गया जो निर्धारित पात्रता मानकों पर खरा नहीं उतरता था।

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याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि संबंधित महिला को जिस पते का निवासी दिखाया गया, वह कथित रूप से पूर्व मंत्री की ही संपत्ति थी। आरोप है कि इस प्रकार फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर सरकारी धन को गलत तरीके से आवंटित किया गया और इसका उपयोग निजी व राजनीतिक लाभ के लिए किया गया। शिकायत में यह भी दावा किया गया कि इस तरह के लाभार्थियों के जरिए चुनावी लाभ लेने और “फर्जी वोट” तैयार करने की कोशिश की गई।

मामले में कार्रवाई में देरी को लेकर याचिकाकर्ता ने अदालत का रुख किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पुलिस ने इस मामले में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच करने में विफल रही। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर ही ठोस और निष्पक्ष जांच जरूरी होती है, ताकि साक्ष्यों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ को रोका जा सके।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर आरोप “विश्वसनीय” प्रतीत होते हैं। अदालत ने माना कि मामले में आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के तत्व शामिल हो सकते हैं। इसी के मद्देनजर न्यू कॉलोनी थाने के प्रभारी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 403, 405, 409 और 420 के तहत मामला दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं, साथ ही भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई करने को कहा गया है।

पुलिस द्वारा पहले दाखिल की गई रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया था कि संबंधित ग्रांट पूर्व मंत्री के अनुरोध पर जारी की गई थी। हालांकि, पुलिस ने यह भी कहा था कि लाभार्थियों की पात्रता और उनके निवास से जुड़े तथ्यों की पुष्टि संबंधित विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों से ही हो सकती है। अदालत ने इस तर्क को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि पुलिस को स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए थी और केवल प्रशासनिक पुष्टि का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में देरी से की गई जांच या सतही रिपोर्ट न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है। इसलिए आवश्यक है कि पूरे मामले की गहराई से जांच की जाए और यह पता लगाया जाए कि क्या वास्तव में सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ और किन-किन लोगों की इसमें भूमिका रही।

यह भी सामने आया है कि इससे पहले एक अन्य अदालत ने इसी तरह के आरोपों में FIR दर्ज करने के निर्देश दिए थे, जिसमें पूर्व मंत्री के साथ उनके परिजनों के नाम भी शामिल थे। उस समय पुलिस ने क्लीन चिट देते हुए रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था और मामले की पुनः जांच के निर्देश दिए थे।

पूर्व मंत्री पर पहले भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण और फर्जी वोटर पंजीकरण जैसे आरोप लग चुके हैं, जिससे यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है। अदालत के ताजा आदेश के बाद अब जांच एजेंसियों पर दबाव बढ़ गया है कि वे निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से जांच पूरी करें।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और ग्रांट वितरण प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक तंत्र की कमजोरियों को उजागर करेगा, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही तय करने की दिशा में भी अहम कदम साबित हो सकता है। फिलहाल, FIR दर्ज होने और आगे की जांच से ही पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकेगी।

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