मुंबई: साइबर ठगी के एक बड़े मामले में मुंबई की सेशन कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए औरंगाबाद के एक व्यवसायी चिश्ती एहतेशामुद्दीन को जमानत दे दी है। यह मामला ₹58.1 करोड़ के कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड से जुड़ा है, जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक को फर्जी जांच एजेंसियों का डर दिखाकर अलग-अलग बैंक खातों में भारी रकम ट्रांसफर कराने का आरोप है।
कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा कि मामले की सुनवाई में काफी समय लग सकता है और अनिश्चित अवधि तक आरोपी को जेल में रखना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी माना कि जांच और ट्रायल लंबा चलेगा, इसलिए इस चरण में हिरासत आवश्यक नहीं है।
यह मामला उस शिकायत पर आधारित है जिसमें पीड़ित ने आरोप लगाया कि साइबर ठगों ने खुद को Telecom Regulatory Authority of India और Central Bureau of Investigation के अधिकारी बताकर उन्हें अवैध गतिविधियों में फंसाने की धमकी दी। इसके बाद पीड़ित को “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर मानसिक दबाव में लिया गया और कथित तौर पर ₹58.1 करोड़ अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवा लिए गए।
कैसे रचा गया ‘डिजिटल अरेस्ट’ का जाल
अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, आरोपियों ने पीड़ित को लगातार व्हाट्सऐप कॉल, वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए डराया। उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज है और सहयोग नहीं करने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी।
इसी मनोवैज्ञानिक दबाव को “डिजिटल अरेस्ट” कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति को बिना किसी वास्तविक गिरफ्तारी के मानसिक रूप से कैद जैसा महसूस कराया जाता है। इसी दौरान पीड़ित से कई बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कराई गई।
आरोपी का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी
आरोपी चिश्ती एहतेशामुद्दीन के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल के खातों में आए पैसे किसी अपराध का हिस्सा नहीं थे, बल्कि पुराने व्यापारिक लेन-देन से जुड़े थे। बचाव पक्ष ने व्हाट्सऐप चैट, ईमेल और वित्तीय रिकॉर्ड भी प्रस्तुत किए।
सेशन जज नितिन वी. जिवणे ने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड के आधार पर यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि सभी ट्रांजैक्शन आपराधिक गतिविधि से ही जुड़े हैं।
गिरफ्तारियां और जांच का दायरा
पुलिस अब तक इस मामले में मुंबई, गुजरात और औरंगाबाद से जुड़े 33 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह एक संगठित साइबर नेटवर्क हो सकता है जो फर्जी पहचान और डिजिटल माध्यमों से बड़े पैमाने पर ठगी कर रहा था। चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।
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साइबर विशेषज्ञ की चेतावनी
साइबर सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी, प्रोफेसर Triveni Singh ने कहा कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ आज के समय में सबसे तेजी से बढ़ता हुआ साइबर फ्रॉड पैटर्न बन चुका है। उनके अनुसार, अपराधी सरकारी एजेंसियों की नकली पहचान बनाकर लोगों को डराते हैं और मनोवैज्ञानिक दबाव में लेकर बड़ी रकम ट्रांसफर करवा लेते हैं।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिक इस तरह के मामलों में सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वे “कानूनी कार्रवाई” जैसे शब्दों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं। उनके अनुसार, किसी भी कथित जांच या गिरफ्तारी की कॉल पर पहले आधिकारिक चैनल से सत्यापन करना ही सबसे बड़ा बचाव है।
बढ़ता ‘डिजिटल अरेस्ट’ ट्रेंड
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में जागरूकता की कमी सबसे बड़ी कमजोरी है। एक बार पीड़ित मानसिक दबाव में आ जाए, तो ठग चरणबद्ध तरीके से रकम निकाल लेते हैं और ट्रांजैक्शन को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
निष्कर्ष
₹58 करोड़ के इस हाई-प्रोफाइल मामले में अदालत का फैसला फिलहाल आरोपी के लिए राहत भरा है, लेकिन जांच जारी है। यह केस एक बार फिर दिखाता है कि कैसे साइबर ठग सरकारी संस्थाओं की नकली पहचान बनाकर लोगों को निशाना बना रहे हैं और डिजिटल युग में यह अपराध कानून-व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
