नोएडा: गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) ने अपने रजिस्ट्रार विष्वास त्रिपाठी को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह बड़ा कदम उस विस्तृत आंतरिक जांच के बाद उठाया गया है, जिसमें उनकी नियुक्ति प्रक्रिया, शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। यह कार्रवाई उस समय और तेज हो गई जब उनके खिलाफ ₹5 करोड़ से अधिक के छात्र फीस घोटाले में FIR दर्ज की गई, जिसमें वित्तीय गड़बड़ी और फर्जी UPI ट्रांजैक्शन के जरिए रकम हेरफेर के आरोप शामिल हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट ने जांच समिति की छह पन्नों की रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए बर्खास्तगी का निर्णय लिया। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नियुक्ति के समय रजिस्ट्रार ने निर्धारित पात्रता मानदंड पूरे नहीं किए थे और उनके आवेदन में “भ्रामक और अप्रमाणित दावे” शामिल थे, जिनका कोई ठोस रिकॉर्ड नहीं मिला।
यह मामला तब गंभीर मोड़ पर पहुंचा जब पिछले सप्ताह त्रिपाठी और 11 अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। आरोप है कि विश्वविद्यालय में छात्र फीस संग्रह से जुड़े सिस्टम में ₹5 करोड़ से अधिक की हेराफेरी की गई और इन धनराशियों को फर्जी UPI ट्रांजैक्शन के माध्यम से छिपाया गया। इस खुलासे के बाद विश्वविद्यालय के वित्तीय नियंत्रण और आंतरिक ऑडिट प्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं।
त्रिपाठी को पहले ही जनवरी में प्रारंभिक शिकायतों के आधार पर सक्रिय जिम्मेदारियों से हटा दिया गया था। अब जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्हें औपचारिक रूप से सेवा से निष्कासित कर दिया गया है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर बड़ा बदलाव देखा गया है।
बर्खास्तगी आदेश में कहा गया है कि वे 15 वर्षों के अनिवार्य शिक्षण अनुभव की शर्त को पूरा नहीं करते थे। साथ ही, उनके द्वारा आवेदन में बताए गए शैक्षणिक और शोध अनुभवों के समर्थन में कोई वैध दस्तावेज, नियुक्ति पत्र या प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किए गए।
जांच समिति ने उनके द्वारा बताए गए जूनियर रिसर्च फेलो (JRF) और सीनियर रिसर्च फेलो (SRF) अनुभवों की भी गहन जांच की, जो 2004 से 2009 के बीच बताए गए थे। रिपोर्ट में कई विसंगतियां सामने आईं, जिनमें दस्तावेजों की कमी और समयावधि में विरोधाभास शामिल हैं, जिससे उनके दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए।
आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि उन्होंने उसी अवधि में पीएचडी कार्यक्रम में भी नामांकन कराया था, जिससे उनके शोध अनुभव की वैधता पर और प्रश्नचिह्न लग गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2018 नियमों के अनुसार, पीएचडी या एमफिल की अवधि को शिक्षण या समकक्ष अनुभव के रूप में नहीं माना जा सकता।
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विश्वविद्यालय ने यह भी पाया कि बार-बार अवसर देने के बावजूद त्रिपाठी अपने अनुभव संबंधी दावों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत करने में असफल रहे। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि उनकी नियुक्ति नियमों के अनुरूप नहीं थी और यह प्रक्रिया में गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है।
इसके अलावा, जांच में उनके रजिस्ट्रार और डीडीओ (Drawing and Disbursing Officer) के रूप में कार्यकाल की भी समीक्षा की गई। इस दौरान वे विश्वविद्यालय के वित्तीय लेन-देन और खातों के सीधे प्रभारी थे। FIR के अनुसार, छात्र फीस रिकॉर्ड और बैंक खातों के बीच बड़ा अंतर पाया गया, जिससे संभावित वित्तीय अनियमितताओं का संकेत मिला।
जांच एजेंसियों का कहना है कि यह गड़बड़ी एक नियमित ऑडिट के दौरान सामने आई, जब सॉफ्टवेयर में दर्ज रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट में अंतर पाया गया। इसके बाद विस्तृत जांच में संभावित डेटा हेरफेर और बाहरी कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच शुरू कर दी गई है।
जांच समिति ने यह भी कहा कि वित्तीय रिकॉर्ड के उचित मिलान में लापरवाही के कारण धन के दुरुपयोग की संभावना बनी। साथ ही, जांच के दौरान उनका व्यवहार “असहयोगात्मक” पाया गया, जिससे जांच प्रक्रिया और जटिल हो गई।
त्रिपाठी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए इस कार्रवाई को “बदले की भावना से प्रेरित” बताया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में सभी नियमों का पालन किया और इस निर्णय को उन्होंने उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
फिलहाल, ₹5 करोड़ फीस फ्रॉड मामले की पुलिस जांच जारी है। अधिकारी डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन और आंतरिक संचार की गहन जांच कर रहे हैं। यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस कथित घोटाले में अन्य कर्मचारी या बाहरी व्यक्ति भी शामिल थे।
अधिकारियों ने कहा है कि यह मामला उच्च शिक्षा संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
