लखनऊ: राजधानी लखनऊ के कोषागार में सामने आए ₹1.42 करोड़ के पेंशन घोटाले में बड़ा प्रशासनिक एक्शन लेते हुए तत्कालीन लेखाकार रेणुका को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। यह कार्रवाई विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई, जिसमें उन्हें पूरे घोटाले का मुख्य आरोपी पाया गया। शासन स्तर पर करीब दो महीने पहले ही यह निर्णय लिया गया था, जिसकी जानकारी अब सार्वजनिक हुई है।
इस बहुचर्चित मामले में पहले ही पुलिस द्वारा दर्ज केस कोर्ट में विचाराधीन है। रेणुका राम मूल रूप से सिद्धार्थनगर जिले के नौगढ़ क्षेत्र की निवासी बताई गई हैं। उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे की सुनवाई जारी है, जबकि विभागीय कार्रवाई के तहत उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया है।
जांच में सामने आया पूरा खेल
मामले की विस्तृत जांच एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा की गई थी, जिसमें चौंकाने वाले खुलासे हुए। जांच रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे घोटाले को अंजाम देने में रेणुका ने अकेले ही मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने अपने रिश्तेदारों और परिचितों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर कई बैंक खाते खुलवाए।
इन खातों से जुड़े एटीएम कार्ड, पासबुक और अन्य जरूरी दस्तावेज भी उन्होंने अपने कब्जे में रखे। इसके बाद वह योजनाबद्ध तरीके से पेंशन की रकम इन खातों में ट्रांसफर करती रहीं और फिर खुद ही बैंक जाकर नकद निकासी कर लेती थीं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन लोगों के नाम पर खाते खोले गए थे, उन्हें इस पूरे फर्जीवाड़े की भनक तक नहीं लगी। यही कारण रहा कि जांच एजेंसियों ने इस मामले में मुख्य रूप से रेणुका राम को ही दोषी ठहराया।
एफआईआर से गिरफ्तारी तक की कार्रवाई
इस मामले में 27 नवंबर 2023 को कैसरबाग थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। शिकायत में रेणुका राम के साथ उनके रिश्तेदार विशाल, गुलभी, रामरती और परिचित प्रतींद्र कश्यप को नामजद किया गया था। आरोप था कि इन सभी के खातों में फर्जी तरीके से पेंशन की रकम ट्रांसफर कर कुल ₹1.42 करोड़ की हेराफेरी की गई।
जांच के बाद पुलिस ने 15 दिसंबर 2023 को रेणुका को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। गिरफ्तारी के साथ ही उन्हें निलंबित कर दिया गया और विभागीय जांच के आदेश जारी किए गए।
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विभागीय जांच में पुख्ता सबूत
विभागीय जांच के दौरान रेणुका के खिलाफ कई ठोस साक्ष्य सामने आए। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सरकारी धन की हेराफेरी की। लंबे समय तक फाइल स्तर पर लंबित रहने के बाद मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा, जहां आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कड़ी कार्रवाई का निर्णय लिया गया।
शासन ने जांच रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।
कोषागार विभाग पहले भी रहा विवादों में
यह पहला मामला नहीं है जब कोषागार विभाग विवादों में आया हो। पिछले साल भी एक महिला कर्मचारी को रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया था, जिसके बाद एंटी करप्शन टीम ने उसे गिरफ्तार किया था। इसके अलावा एक अन्य मामले में मृत व्यक्ति के नाम पर उसके परिजन द्वारा पेंशन निकालने का मामला भी सामने आया था, जिसमें रिकवरी की प्रक्रिया अभी जारी है।
इन घटनाओं ने विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय लेन-देन से जुड़े विभागों में डिजिटल निगरानी और ऑडिट सिस्टम को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
जांच और न्यायिक प्रक्रिया जारी
फिलहाल, इस पूरे मामले में दर्ज आपराधिक मुकदमा अदालत में लंबित है। पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट के आधार पर आगे की सुनवाई जारी है। वहीं विभागीय कार्रवाई पूरी होने के बाद प्रशासन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यह मामला न केवल सरकारी तंत्र में पारदर्शिता की जरूरत को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि किस तरह आंतरिक नियंत्रण कमजोर होने पर एक व्यक्ति बड़े स्तर पर वित्तीय घोटाले को अंजाम दे सकता है। आने वाले समय में इस केस का अंतिम फैसला कई मायनों में अहम माना जा रहा है।
