पुणे: महाराष्ट्र के पुणे में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां एक बैंक कर्मचारी से कथित तौर पर ₹8.5 लाख की ठगी कर ली गई। ठगों ने खुद को बैंक के असली खाताधारक के रूप में पेश किया और झूठी आपात स्थिति बनाकर RTGS ट्रांसफर करा लिया। इस घटना ने बैंकिंग सेक्टर में सोशल इंजीनियरिंग आधारित साइबर अपराधों की बढ़ती चुनौती को फिर से उजागर कर दिया है।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित कर्मचारी पुणे के जंगली महाराज रोड स्थित एक बैंक शाखा में कार्यरत है। आरोपियों ने उसे फोन कर खुद को ग्राहक बताया और दावा किया कि एक अत्यंत जरूरी लंबित लेनदेन तुरंत पूरा किया जाना है। इस दौरान उन्होंने फर्जी बैंक खाता विवरण भी उपलब्ध कराए, जिससे कॉल और अनुरोध वास्तविक प्रतीत हो।
सूचना को वास्तविक बैंकिंग निर्देश मानकर कर्मचारी ने बिना अतिरिक्त सत्यापन के ₹8.5 लाख का RTGS ट्रांसफर प्रोसेस कर दिया। बाद में यह धोखाधड़ी तब सामने आई जब वास्तविक खाताधारक ने स्पष्ट किया कि उसने ऐसा कोई लेनदेन किया ही नहीं था। इसके बाद बैंक ने आंतरिक जांच शुरू की और मामला शिवाजीनगर पुलिस स्टेशन तक पहुंचा।
अधिकारियों ने पुष्टि की है कि अज्ञात साइबर अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है और पूरे फंड ट्रेल की जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि यह रकम किन खातों में ट्रांसफर की गई और इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस ठगी को किसी तकनीकी हैकिंग के बजाय पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग तकनीक से अंजाम दिया गया। जांच अधिकारियों के अनुसार, आरोपियों ने बातचीत के दौरान अत्यधिक आपात स्थिति बनाई, जिससे कर्मचारी पर तुरंत ट्रांसफर करने का दबाव बन गया और वह सामान्य वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी।
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साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में अपराधी बैंकिंग सिस्टम को हैक नहीं करते, बल्कि मानवीय विश्वास और जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। वे खुद को ग्राहक या वरिष्ठ अधिकारी बताकर भ्रम पैदा करते हैं और कर्मचारियों को नियमों से हटकर निर्णय लेने पर मजबूर कर देते हैं।
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपियों के डिजिटल फुटप्रिंट की जांच की जा रही है, जिसमें मोबाइल नंबर, IP एड्रेस और उन बैंक खातों की जानकारी शामिल है जहां पैसा ट्रांसफर हुआ। इसके साथ ही संदिग्ध खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है ताकि रकम की निकासी रोकी जा सके।
घटना के बाद संबंधित बैंक ने अपने RTGS वेरिफिकेशन सिस्टम की आंतरिक समीक्षा शुरू कर दी है। जांच की जा रही है कि क्या सभी अनिवार्य सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या कहीं कोई चूक हुई, जिससे यह ट्रांजैक्शन पास हो गया।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, आजकल बैंकिंग धोखाधड़ी का बड़ा हिस्सा तकनीकी खामियों के बजाय मनोवैज्ञानिक दबाव और फर्जी पहचान पर आधारित होता है। अपराधी जानबूझकर भय और तुरंत कार्रवाई की स्थिति बनाते हैं ताकि जांच प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सके।
पुलिस ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को सलाह दी है कि किसी भी उच्च मूल्य के ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने से पहले ग्राहक से सीधे संपर्क कर पुष्टि अनिवार्य रूप से की जाए। साथ ही, फोन या अनौपचारिक माध्यम से आए निर्देशों पर तुरंत कार्रवाई करने से बचने की अपील की गई है।
यह मामला उन बढ़ते साइबर अपराधों में शामिल है, जिनमें बैंक कर्मचारी ही ठगों के निशाने पर आ जाते हैं। अधिकारियों ने कहा कि जागरूकता प्रशिक्षण और सख्त वेरिफिकेशन नियम ही ऐसे मामलों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका हैं।
फिलहाल पुलिस सभी संभावित सुरागों पर काम कर रही है और उम्मीद है कि डिजिटल सबूतों के आधार पर जल्द ही आरोपियों तक पहुंचा जा सकेगा। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इस पूरे रैकेट के पीछे कोई संगठित नेटवर्क सक्रिय है।
