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‘सिस्टम में एंट्री, बैंक में जीरो’: ₹5 करोड़ फीस घोटाले ने खोली यूनिवर्सिटी की पोल

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By Roopa
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ग्रेटर नोएडा: गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में सामने आए ₹5 करोड़ के फीस घोटाले ने शैक्षणिक संस्थानों की वित्तीय पारदर्शिता और आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी समेत 12 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। शिकायत विश्वविद्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार द्वारा स्थानीय कोतवाली में दर्ज कराई गई, जिसके बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह मामला छात्रों से वसूली गई फीस में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी से जुड़ा है। आरोप है कि करीब ₹5 करोड़ की राशि विश्वविद्यालय के सॉफ्टवेयर सिस्टम में जमा दिखाई गई, लेकिन यह रकम आधिकारिक बैंक खातों तक पहुंची ही नहीं। इस विसंगति ने पूरे मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता और गबन के रूप में उजागर किया है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, लेखा अनुभाग के कुछ कर्मचारियों ने डेटा एंट्री के लिए नियुक्त आउटसोर्स स्टाफ के साथ मिलकर इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया। छात्रों को फीस जमा करने के नाम पर नकली रसीदें जारी की गईं, जिससे सिस्टम में भुगतान दर्ज हो गया, लेकिन वास्तविक राशि बैंक में जमा नहीं की गई। इस प्रक्रिया के जरिए विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और बैंकिंग डेटा के बीच बड़ा अंतर पैदा किया गया।

सूत्रों के मुताबिक, इस घोटाले का खुलासा वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान हुई आंतरिक जांच में हुआ। जांच में बड़े पैमाने पर वित्तीय जालसाजी, धोखाधड़ी और गबन के संकेत मिले, जिसके बाद मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई। इसी आधार पर अब प्राथमिकी दर्ज की गई है।

प्राथमिकी में पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी, तत्कालीन वित्तीय अधिकारी नीरज कुमार, तत्कालीन लेखाधिकारी शैलेन्द्र कुमार शर्मा समेत कुल 12 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा लेखा अनुभाग से जुड़े अन्य कर्मचारी और आउटसोर्स स्टाफ भी जांच के दायरे में हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह घोटाला संगठित तरीके से अंजाम दिया गया, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की संभावना है।

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हालांकि, पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. विश्वास त्रिपाठी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्हें प्रतिशोध की भावना से इस मामले में फंसाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि फीस से संबंधित मामलों का निर्णय लेना रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और इस प्रक्रिया में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी।

उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ उनके मतभेद पहले से चल रहे थे और यह कार्रवाई उसी का परिणाम है। उनके अनुसार, उन्होंने पहले कुछ मामलों में अनियमितताओं को उजागर किया था, जिसके बाद उनके खिलाफ कदम उठाए गए। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने इस मामले को लेकर न्यायालय का रुख किया है और वहां से उन्हें राहत भी मिली थी।

दूसरी ओर, जांच एजेंसियों का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की गहराई से जांच की जा रही है। बैंक खातों, सॉफ्टवेयर एंट्री, रसीदों और वित्तीय दस्तावेजों का मिलान किया जा रहा है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि रकम किस स्तर पर और कैसे गायब हुई। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस घोटाले से किसे लाभ पहुंचा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की कमजोरी और निगरानी की कमी का फायदा उठाया जाता है। यदि नियमित ऑडिट और क्रॉस-वेरिफिकेशन किया जाता, तो इस तरह की गड़बड़ी को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ा जा सकता था।

फिलहाल, पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच तेज कर दी है और जल्द ही आरोपियों से पूछताछ की जा सकती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इस घोटाले से जुड़े और भी खुलासे होने की संभावना है। यह मामला न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत निगरानी तंत्र कितना आवश्यक है।

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