मुंबई: ₹100 करोड़ के पंजाब नेशनल बैंक (PNB) लोन फ्रॉड मामले में विशेष अदालत ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए 11 आरोपियों को जमानत दे दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है, सभी जरूरी साक्ष्य पहले ही जब्त किए जा चुके हैं और अब आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले को मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।
विशेष न्यायाधीश जे. पी. दरेकर ने सभी आरोपियों के लिए लगभग समान आदेश पारित करते हुए यह दर्ज किया कि जांच के दौरान किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी। चार्जशीट दाखिल होने के बाद सभी आरोपी समन के आधार पर अदालत के समक्ष पेश हुए थे। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि “अब आरोपियों से कुछ भी बरामद किया जाना शेष नहीं है,” ऐसे में उनकी न्यायिक हिरासत उचित नहीं ठहराई जा सकती।
यह मामला 2013 से 2017 के बीच सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स लिमिटेड को दिए गए लोन से जुड़ा है। आरोप है कि कंपनी और उसके प्रमोटरों ने 335 कमर्शियल वाहनों की खरीद के नाम पर बैंक से लगभग ₹100 करोड़ का कर्ज लिया। जांच में सामने आया कि इस प्रक्रिया में गलत जानकारी और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, जिससे बैंक को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।
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प्राथमिक जांच के अनुसार, जिन वाहनों के नाम पर लोन लिया गया, उनमें से केवल करीब 240 वाहनों का ही वैध रिकॉर्ड उपलब्ध पाया गया। कई वाहन या तो अन्य स्रोतों से फाइनेंस किए गए थे या उनका कोई स्पष्ट पता नहीं चल सका। इस कथित अनियमितता के चलते बैंक को लगभग ₹87.46 करोड़ का नुकसान हुआ, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
जमानत पाने वालों में कंपनी के प्रमोटर और निदेशक रूपचंद बैद, दीपक कुमार बैद, राजकुमार रूपचंद बैद और लक्ष्मीदेवी बैद शामिल हैं। इसके अलावा अन्य कारोबारी भी इस मामले में आरोपी हैं, जिन पर लोन प्रक्रिया में सहयोग करने और कथित अनियमितताओं को अंजाम देने में भूमिका निभाने का आरोप है।
मामले में बैंक के कुछ पूर्व और वर्तमान अधिकारियों के नाम भी सामने आए हैं। आरोप है कि लोन स्वीकृति और वितरण के दौरान आवश्यक जांच-पड़ताल में लापरवाही बरती गई, जिससे यह बड़ा वित्तीय घोटाला संभव हो सका। हालांकि अदालत ने जमानत पर सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि आरोपों की गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन जांच पूरी होने के बाद हिरासत की आवश्यकता नहीं रह जाती।
अभियोजन पक्ष ने अपने आरोपों में कहा था कि सभी आरोपी आपराधिक साजिश के तहत एक साथ आए और योजनाबद्ध तरीके से बैंक को धोखा देने के लिए फर्जी दस्तावेजों और गलत जानकारी का इस्तेमाल किया। लोन स्वीकृत होने के बाद राशि का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया और संपत्तियों को पूरी तरह बैंक के पक्ष में गिरवी नहीं रखा गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में धोखाधड़ी और साजिश के आरोप गंभीर हैं, लेकिन जांच एजेंसियों द्वारा जुटाए गए साक्ष्य पहले ही जब्त किए जा चुके हैं। ऐसे में आगे की पूछताछ के लिए आरोपियों को कस्टडी में रखने का कोई ठोस आधार नहीं है।
इस मामले की जांच दिसंबर 2022 में दर्ज प्राथमिकी के बाद शुरू हुई थी। इसके बाद विस्तृत वित्तीय जांच के जरिए लोन वितरण, वाहन खरीद और फंड के उपयोग की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल की गई। जांच एजेंसियों ने बैंक रिकॉर्ड, कंपनी के दस्तावेज और अन्य वित्तीय लेनदेन से जुड़े अहम साक्ष्य जुटाए।
फिलहाल, अदालत के इस फैसले के बाद सभी आरोपी जमानत पर रिहा रहेंगे, जबकि मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी। आने वाले समय में अदालत में पेश किए जाने वाले साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर इस बहुचर्चित बैंकिंग फ्रॉड केस की दिशा और अंतिम परिणाम तय होगा।
