कानपुर के अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट में 30 से अधिक ऑपरेशन से जुड़े मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी के बाद जांच तेज हुई

‘सादगी के पीछे साजिश’: गांव में रहकर देशभर को बनाते थे निशाना, 20 साइबर ठग गिरफ्तार

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By Roopa
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कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात क्षेत्र से साइबर अपराध का एक संगठित और चौंकाने वाला मॉडल सामने आया है, जहां ग्रामीण सादगी की आड़ में वर्षों से डिजिटल ठगी का नेटवर्क संचालित हो रहा था। रठिगांव और आसपास के इलाकों में हाल ही में की गई कार्रवाई में 20 आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद खुलासा हुआ है कि यहां करीब एक दशक से “साइबर क्राइम की पाठशाला” चल रही थी। इस नेटवर्क के जरिए युवाओं और किशोरों को ऑनलाइन ठगी के तरीके सिखाकर उन्हें पेशेवर अपराधी बनाया जा रहा था।

जांच के अनुसार, आरोपी दिन में सामान्य ग्रामीणों की तरह जीवन जीते थे। वे घर से यह कहकर निकलते थे कि खेतों में काम करने या पशु चराने जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे अलग-अलग स्थानों पर बैठकर मोबाइल फोन के जरिए देशभर के लोगों को निशाना बनाते थे। ग्रामीणों ने भी स्वीकार किया कि उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनके बीच रहने वाले युवक इतने बड़े साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा हैं।

पुलिस जांच में सामने आया है कि गिरोह के सदस्य आवाज बदलने में बेहद माहिर थे। वे कभी खुद को बैंक अधिकारी, कभी पुलिस अधिकारी और कई बार महिला बनकर लोगों से बात करते थे, ताकि आसानी से उनका विश्वास जीत सकें। इसके बाद वे लोगों से ओटीपी, बैंक डिटेल या सीधे पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे। नए सदस्यों को भी इन तकनीकों की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती थी, जिससे गिरोह लगातार विस्तार करता जा रहा था।

साइबर ठगी से अर्जित रकम का इस्तेमाल भी बेहद योजनाबद्ध तरीके से किया जाता था। आरोपी गांव में अपनी जीवनशैली सामान्य बनाए रखते थे, ताकि किसी को शक न हो। वे अवैध कमाई को सीधे खर्च करने के बजाय प्रॉपर्टी में निवेश करते, प्लॉट खरीदते या दूसरे शहरों में जाकर खर्च करते थे। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ आरोपियों ने इस पैसे से महंगे शौक और ऐशो-आराम पर भी बड़ी रकम खर्च की।

हाल ही में पुलिस और विशेष टीमों ने रठिगांव के लीलादास का पुरवा क्षेत्र में व्यापक कार्रवाई की। इस दौरान गांव में रूट मार्च किया गया और संदिग्ध ठिकानों पर दबिश दी गई। जांच के दौरान गिरफ्तार आरोपियों की संपत्तियों का आकलन किया गया, जिसमें कम से कम पांच लोगों की संपत्ति उनकी घोषित आय से अधिक पाई गई है। इसके बाद अब वित्तीय जांच भी तेज कर दी गई है, ताकि अवैध कमाई के स्रोत और उसके उपयोग का पता लगाया जा सके।

जांच एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं था। मोबाइल और इंटरनेट के जरिए यह गिरोह देश के कई राज्यों में सक्रिय था और अलग-अलग तरीकों से लोगों को निशाना बना रहा था। अधिकारियों का कहना है कि अब तक सामने आए मामले इस पूरे नेटवर्क का केवल एक हिस्सा हो सकते हैं, जबकि असल दायरा इससे कहीं अधिक बड़ा हो सकता है।

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पुलिस कार्रवाई के बाद प्रभावित गांवों का माहौल बदल गया है। निगरानी बढ़ा दी गई है और संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। स्थानीय लोगों से भी जानकारी जुटाई जा रही है, ताकि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा सके।

Prof. Triveni Singh, प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी, ने इस तरह के मामलों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, “संगठित साइबर गिरोह अब छोटे कस्बों और गांवों में ‘ट्रेनिंग मॉडल’ पर काम कर रहे हैं। पहले नए लोगों को कॉल स्क्रिप्ट, सोशल इंजीनियरिंग और भरोसा जीतने की तकनीक सिखाई जाती है, फिर उन्हें अलग-अलग टारगेट पर लगाया जाता है। आवाज बदलना, फर्जी पहचान बनाना और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना इनके मुख्य हथियार होते हैं। समय रहते ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई न हो, तो ये तेजी से फैलते हैं और बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान करते हैं।”

विशेषज्ञों के अनुसार, तेजी से पैसा कमाने की लालसा और स्थानीय स्तर पर अपराध की बढ़ती स्वीकार्यता ऐसे नेटवर्क को बढ़ावा देती है। जब एक ही क्षेत्र में कई लोग इसमें शामिल हो जाते हैं, तो यह धीरे-धीरे एक संगठित तंत्र का रूप ले लेता है, जिसे खत्म करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

फिलहाल, गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ जारी है और फरार 14 आरोपियों की तलाश के लिए लगातार दबिश दी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं। यह मामला न केवल साइबर अपराध के बदलते स्वरूप को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि अब डिजिटल ठगी का नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्रों में भी गहरी जड़ें जमा चुका है।

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