बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसले में राज्य सरकार के अधिकारियों और निजी व्यक्तियों की कथित मिलीभगत से जुड़े 63.33 एकड़ जमीन अधिग्रहण मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने इसे “सिस्टमैटिक और संवैधानिक फ्रॉड” करार देते हुए पूरे मामले की विस्तृत जांच के लिए FIR दर्ज करने का निर्देश दिया है।
दो जजों की खंडपीठ—जस्टिस डी के सिंह और तारा वितस्ता गंजू—ने 10 अप्रैल को यह आदेश पारित करते हुए कहा कि मामले की प्रकृति इतनी गंभीर है कि निष्पक्ष जांच राज्य एजेंसियों से संभव नहीं है, क्योंकि इसमें स्वयं राज्य तंत्र की भूमिका संदिग्ध है।
भूमि अधिग्रहण अधिसूचना रद्द
हाईकोर्ट ने केवल CBI जांच के आदेश ही नहीं दिए, बल्कि बेंगलुरु के हेब्बल और अम्मानिकेरे गांवों में 63.33 एकड़ भूमि अधिग्रहण से जुड़ी अंतिम अधिसूचना को भी रद्द कर दिया। यह जमीन निजी व्यक्तियों की थी, जिन्होंने अधिग्रहण प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी थी।
अदालत ने आदेश में यह भी निर्देश दिया कि M/s Lakeview Tourism Corporation को ₹10 लाख की राशि आर्मी बैटल कैजुअल्टीज़ वेलफेयर फंड में चार सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी।
निजी प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण का आरोप
मामले में आरोप है कि सरकारी अधिकारियों और निजी डेवलपर्स ने मिलकर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को इस तरह आगे बढ़ाया, जिसका असली उद्देश्य सार्वजनिक हित नहीं बल्कि एक निजी पर्यटन परियोजना को लाभ पहुंचाना था।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जिस कंपनी के लिए जमीन अधिग्रहित की गई, उसके प्रमोटर्स ने 2000 में ही प्रस्ताव दिया था, जबकि उस समय कंपनी पूरी तरह पंजीकृत भी नहीं थी। प्रस्तावित प्रोजेक्ट में रिसॉर्ट, फाइव स्टार होटल और मनोरंजन पार्क शामिल थे।
FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: “कानून का दुरुपयोग”
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि KIAD अधिनियम का उद्देश्य औद्योगिक विकास के लिए सार्वजनिक हित में भूमि अधिग्रहण करना है, न कि निजी कंपनियों या व्यक्तियों को लाभ पहुंचाना।
बेंच ने टिप्पणी की कि यदि किसी निजी इकाई को लाभ पहुंचाने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाए तो यह “कानून के साथ धोखा” और संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।
धोखाधड़ी पर ‘फाइनल ऑर्डर’ भी खत्म नहीं: हाईकोर्ट
निजी पक्ष की यह दलील खारिज कर दी गई कि पिछली अदालती कार्यवाही के कारण मामला अंतिम रूप ले चुका है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर किसी फैसले में धोखाधड़ी या गलत जानकारी साबित होती है, तो उसकी अंतिमता समाप्त हो जाती है।
अदालत ने कहा कि “फ्रॉड सामने आने पर किसी भी निर्णय को रद्द किया जा सकता है,” और कानून का गलत इस्तेमाल न्यायिक संरक्षण का आधार नहीं बन सकता।
CBI को FIR दर्ज कर जांच का आदेश
हाईकोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में FIR दर्ज कर सभी संबंधित सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका की जांच करे। अदालत ने कहा कि जांच का उद्देश्य पूरे षड्यंत्र की परतें खोलना और जिम्मेदार लोगों को सामने लाना है।
कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा असर डाल सकता है। अदालत की सख्त टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि भविष्य में सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग पर न्यायिक निगरानी और कड़ी होगी।
मामला अब CBI के पास चला गया है, जहां एजेंसी को पूरे प्रशासनिक निर्णयों, दस्तावेजों और कथित साजिश की गहराई से जांच करनी होगी।
